Sunday, October 9, 2011

"निःश्वांस"

वक़्त खेल रहा है 
समुद्र की लहरों के साथ...
पल में उसे उछालता 
आसमान में,
जैसे एक काबिल खिलाड़ी 
उछाल देता है फुटबाल को....

सागर तट पर बैठा...
तुझे सोचता...
देखता रहा उसी ओर,
जिस ओर तुम गयी हो... अभी अभी...
तट की भीगी मुलायम रेत पर 
चमकते तुम्हारे कोमल पैरों के 
खुबसूरत छाप...
मुस्कुराते हुए से लगते हैं...
मानो वादा कर रहे हों, 
क्षनान्तर में लौट आने का...

तभी अचानक...!!
वक़्त के पैरों उछाली जाकर,
लहरें... तट पर आन गिरी...
और पल भर में लौट गईं...
वक़्त के पैरों की ओर...
फिर से उछाल दिए जाने के लिए...
लेकिन... जाते हुए...
मुस्कुरा कर...  
क्षनान्तर में लौट आने का...
वादा सी करती 
तुम्हारे पैरों की,
कोमल, सुन्दर छाप भी,
ले गयी अपने साथ....

आह...!!
तट की भीगी रेत 
अब एकदम सपाट हो चली है...
एक गहरे निःश्वांस की तरह...
और वक़्त...??
वह मशगुल है...
अपने खेल में अभी भी... 

******************** 

32 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर रचना....

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  2. वक़्त खेल रहा है
    समुद्र की लहरों के साथ...
    पल में उसे उछालता
    आसमान में,
    जैसे एक काबिल खिलाड़ी
    उछाल देता है फुटबाल को......

    आह...!!
    तट की भीगी रेत
    अब एकदम सपाट हो चली है...
    एक गहरे ‘निःश्वांस’ की तरह...
    और वक़्त...??
    वह मशगुल है...
    अपने खेल में अभी भी... ...बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति

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  3. एक गहरे ‘निःश्वांस’ की तरह...
    बधाई सुंदर प्रस्तुति के लिये.

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  4. वक़्त के खेल निराले होते हैं।
    भावपूर्ण कविता के लिए बधाई।

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  5. आह...!!
    तट की भीगी रेत
    अब एकदम सपाट हो चली है...
    एक गहरे ‘निःश्वांस’ की तरह...
    और वक़्त...??
    वह मशगुल है...
    अपने खेल में अभी भी... behtreen prstuti...

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  6. सागर तट पर बैठा...
    तुझे सोचता...
    देखता रहा उसी ओर,
    जिस ओर तुम गयी हो... अभी अभी...
    तट की भीगी मुलायम रेत पर
    चमकते तुम्हारे कोमल पैरों के
    खुबसूरत छाप...
    मुस्कुराते हुए से लगते हैं...
    मानो वादा कर रहे हों,
    क्षनान्तर में लौट आने का...

    behad sunder ashavadi rachna. badhai.

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  7. आह...!!
    तट की भीगी रेत
    अब एकदम सपाट हो चली है...
    एक गहरे ‘निःश्वांस’ की तरह...
    और वक़्त...??
    वह मशगुल है...
    अपने खेल में अभी भी... वक़्त का खेल और मन ! वक़्त क्यूँ नहीं रुक जाता कुछ देर मन के लिए ...

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  8. सुंदर प्रस्तुति |
    बधाई |।

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  9. आह...!!
    तट की भीगी रेत
    अब एकदम सपाट हो चली है...
    एक गहरे ‘निःश्वांस’ की तरह...
    और वक़्त...??
    वह मशगूल है...
    अपने खेल में अभी भी...

    बहुत खूब ,हबीब भाई.
    आपने बहुत शिद्दत के साथ वक़्त को महसूस किया है.

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  10. कुछ यादें समय के साथ गहराती जाती हैं।

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  11. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  12. वक्त तो अपने खेलो मे ही लगा रहता है………………सुन्दर प्रस्तुति।

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  13. लेकिन... जाते हुए...
    मुस्कुरा कर...
    क्षनान्तर में लौट आने का...
    वादा सी करती
    तुम्हारे पैरों की,
    कोमल, सुन्दर छाप भी,
    ले गयी अपने साथ....

    ....वक़्त की लहरों पर किसका बस चलता है...बहुत मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति...

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  14. और वक़्त...??
    वह मशगुल है...
    अपने खेल में अभी भी...
    'वक्त' वक्त-बेवक्त अपने खेल खेलता ही रहता है
    बहुत सुन्दर भाव की रचना

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  15. वक़्त के पैरों उछाली जाकर,
    लहरें... तट पर आन गिरी...
    और पल भर में लौट गईं...
    वक़्त के पैरों की ओर...
    फिर से उछाल दिए जाने के लिए...
    लेकिन... जाते हुए...
    मुस्कुरा कर...
    क्षनान्तर में लौट आने का...
    वादा सी करती
    तुम्हारे पैरों की,
    कोमल, सुन्दर छाप भी,
    ले गयी अपने साथ....

    कमाल है भाई कमाल है। बधाई। इस कल्पना ने प्रभावित किया।

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  16. बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना आभार

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  17. वक़्त का ......
    ये खेल अभी है जारी, बिछड़े सभी बारी-बारी.
    संजय जी ! लहर, पद छाप, नि:शंवास, वक़्त
    इन पात्रों से कुशल निर्देशक की भाँति अभिनय कराने के लिये शुभकामनायें.

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  18. बहुत सुंदर रचना।

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  19. बहुत ख़ूबसूरत एवं भावपूर्ण रचना! लाजवाब प्रस्तुती!

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  20. वक़्त का खेल तो निरंतर चलता ही रहता है!
    सुन्दर रचना!

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  21. अति सुन्दर अभिव्यक्ति. उत्तम रचना.
    प्रतीकों के माध्यम से, समय की रेत
    पर अंकित, अति सुन्दर हस्ताक्षर.
    बहुत - बहुत धन्यवाद.
    ...आनन्द विश्वास

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  22. समय ऐसे ही छीन लेता है पल ... कुछ यादें भी ऐसी ही गुम जाती हैं ...

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  23. आपकी किसी पोस्ट की चर्चा है नयी पुरानी हलचल पर कल शनिवार 10-12-11. को । कृपया अवश्य पधारें और अपने अमूल्य विचार ज़रूर दें ..!!आभार.

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  24. यही तो वक्त का सितम है…………बहुत उम्दा।

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  25. तट की भीगी मुलायम रेत पर
    चमकते तुम्हारे कोमल पैरों के
    खुबसूरत छाप...
    मुस्कुराते हुए से लगते हैं...
    मानो वादा कर रहे हों,
    क्षनान्तर में लौट आने का...

    wah kya bhav hain....

    puri kavita pasand aayi...

    www.poeticprakash.com

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  26. बहुत ही सुंदर रचना. मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है.
    http://monijain21dec.blogspot.com/

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  27. आह...!!
    तट की भीगी रेत
    अब एकदम सपाट हो चली है...
    एक गहरे ‘निःश्वांस’ की तरह...
    और वक़्त...??
    वह मशगुल है...
    अपने खेल में अभी भी...
    मिश्रा जी आज का दिन बहुत शुभ है मेरे लिए ....आखिर आ ही गया आपके अंजुमन में ...ईश्वर से प्रार्थना है कि अब यहीं का होकर रह जाऊं !

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  28. shabdo ke sunder sashak prayog ne chalchitr sa paish kar diya hai manodasha ka.

    sunder srijan.

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  29. भावमय चित्र-सा अंकित कर दिया है !

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मेरी हौसला-अफजाई करने का बहुत शुक्रिया.... आपकी बेशकीमती रायें मुझे मेरी कमजोरियों से वाकिफ करा, मुझे उनसे दूर ले जाने का जरिया बने, इन्हीं तमन्नाओं के साथ..... आपका हबीब.

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