Tuesday, November 16, 2010

कल/आज

(१)
कल
तेरी यादों के तार
जोड़ - जोड़ कर
बुना था एक जाल, और
टांग दिया उसे आसमान में,
कि फसेंगी उसमें
खुशियाँ... ढेर सारी....

आज
बड़ी उम्मीद से
उतारा जब जाल,
फंसा पाया उसमें एक -
भयावह सन्नाटा.... विद्रूप सा...

किंकर्तव्यविमूढ़ अब
देख रहा हूँ सन्नाटे को,
और सन्नाटा मुझको......


(2)
कल
एक पत्थर - मासूम सा...
दिल को अच्छा लगा...

मैंने
कल्पना की औजारें लीं,
उसे तराशा,
और बो दिया
ख़्वाबों के समंदर में,
कमल की तरह...
कि खिलेगा वह
मकायेगा फजां ज़िंदगी की....

मगर!
मेरे ख़्वाबों का
सारा समंदर पीकर भी
वह ना खिला....

आज
ख्वाब नहीं हैं - मेरे पास,
बस,
ज़िंदगी है.... सूखी सी.... हक़ीक़तों भरी....

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Sunday, November 14, 2010

"स्वर्ग उसे ही जग कहता है..."

समस्त सुधि मित्रों को सादर नमस्कार, आप सभी सम्माननीय जनों एवं देश भर के लाडलों को आज १४ नवम्बर अर्थात बालदिवस की स्नेहिल बधाइयां। आदरणीय मित्रों, आज बाल दिवस के प्यारे अवसर पर "बालगीत" के माध्यम से एक शाश्वत तथ्य को आप सुधीजनों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूँ.....

"स्वर्ग उसे ही जग कहता है..."

एक देश था सच्चा सा
राजा उसका बच्चा था।
भेद - भाव की बात नहीं थी,
प्रेम की गंगा वहाँ बही थी।
साथ में सोते, साथ में उठते,
साथ में खेले, साथ में पढ़ते।
मिल जुलकर रहते थे सारे,
आसमान में जैसे तारे।
सबकी करते साथ भलाई,
वहाँ बसी थी बस अच्छाई।

फिर आया था इक शैतान,
हट्टा - कट्टा बड़ा जवान।
जाने कैसा पाठ पढ़ाया,
हिन्दू, मुल्ला, सिक्ख बनाया।
बदल गईं ज़न्नत की बातें,
लगने लगी वहाँ भी घातें।
ये तेरा, ये मेरा हो गया,
दुर्भावों का फेरा हो गया।
कल तक थे जो भाई - भाई,
उनमें होने लगी लड़ाई।

दुश्मन की तो नज़र गडी थी,
सेना उसकी बहुत बड़ी थी।
देखी जो बच्चों की लड़ाई,
तुरत ही कर दी उसने चढ़ाई।
बच्चों की ताक़त जो बटी थी,
ताक़त उनकी खूब घटी थी।
दुश्मन कर गया अपना काम,
सारे बच्चे हुए ग़ुलाम।

क़ैद में सारे सोंचे अब,
अपना ही सर नोंचे अब।
बात समझ में देर से आई,
बुरा था झगडा, बुरी लड़ाई।
लेकिन अब क्या होता है,
जो लड़ता है खोता है।

देखो बच्चों तुम ना लड़ना,
प्रश्न सभी से इतना करना।
आपस में जब सारे भाई,
कैसा झगड़ा और लड़ाई?
प्रेम भाव जहां बसता है,
स्वर्ग उसे ही जग कहता है।

***** बाल दिवस की शुभकामनाएं *****

Saturday, November 13, 2010

अपने समस्त स्नेही स्वजनों को सादर नमस्कार.... । सम्माननीय मित्रों, टिप्पणियों के रूप में आपका स्नेह और मार्गदर्शन ज़ेहन में नई ऊर्जा और विचारों में ताजगी का संचार करता है... । विश्वास है कि ऊर्जा और ताजगी का संचार करने वाले ये स्नेहिल कारक अपने प्रभामंडल से इस नाचीज़ की राहें रौशन करते रहेंगे.... ।
मित्रों, रोजमर्रा के जीवन में अनेक घटनाएं नज़रों में से गुजरती हैं, किन्तु कुछ घटनाएं अपनी शिद्दत, अपनी तीक्ष्णता के साथ अंतर में कहीं पेबस्त हो जाती हैं, रोपित हो जाती हैं और विचारों की नमी पाकर अंकुरित हो जाती हैं। यह अंकुरण कभी सुन्दर पुष्पों की ओर अग्रसर होता है, तो कभी कंटीली झाड़ियाँ भी बन जाती हैं... । एक सौजन्य मिलन और गोष्ठी के कार्यक्रम हेतु बिलासपुर जाते हुए रेलवे स्टेशन पर कल ऐसी ही एक घटना का गवाह बना। ऐसी घटना जिसके समाधान पर काफी कुछ लिखा जाता है, योजनायें बनायी जाती हैं, बड़ी बड़ी गोष्ठियां होती हैं, शाशकीय योजनाओं पर इफरात धन खर्च किये जाते हैं, किन्तु सफलता .....??? उस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया को १४ नवम्बर बाल दिवस के अवसर पर आप गुणीजनों के साथ बांटने का अभिलाषी हूँ। एक आत्म व्यंग्य, जो अपने आप में सार्भौमिक व्यंग्य है....
-: समाधान :-
रेलवे स्टेशन में
प्लेटफार्म की चेयर पर,
ट्रेन का इंतज़ार करते
फ़िल्मी मैगजीन पर नज़रें गडाए,
वक़्त गुज़ार रहा था,
कि घुटने के पास
झूल गया एक चिथड़ा - मैला सा।
देखा -
दस बरस का एक लड़का
अपने बनियान की तरह ही
मैला - कुचैला..., शायद 'चिथड़ा' भी...!
खड़ा था अपने नन्हें हाथों को फैलाए...
शायद उसकी हालत पर द्रवित हो,
शायद औपचारिकतावश
बहुत सी बातें कह डाली मैनें,
कुछ प्यार की, कुछ समझाईश,
कुछ सहानुभूति की, कुछ प्रश्न भी...!!
किन्तु जवाब में
बस देखता रहा वह - अपलक...
समझ ना सका
क्या था, उसकी आँखों में -
उदासी...? मजबूरी...?? व्यथा...??? प्रश्न...????
हारकर/शायद बेचैन होकर,
एक 'टुकडा' सरका दिया मैंने -
अपनी 'दया' का -
खुली हुयी उसकी हथेली पर...!!
अब यूँही पडा है,
मेरी गोद में वह मैगजीन,
वक़्त गुजारने के लिए -
अब नहीं है
उसकी आवश्यकता...!!!
अब तो तमाम वक़्त,
मैं सोचूंगा/शायद कोसुंगा भी,
समाज को...! सरकार को...!! व्यवस्था को...!!!
अकर्मण्यता हेतु/ या हो सकता है,
कोइ लेख, कोइ कविता ही लिख डालूँ,
उस 'बालक' और उसकी 'आँखों' के नाम...!!!!
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"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

एक नज़र इधर भी...