खुशी
गुलाब की
पांखुरी को छूते ही
खामोशी से उतर आई
मेरी तर्जनी की नाख़ून पर
मुस्कुराती हुई
ओस की एक बूँद.....
अभी,
मेरी नाडियों का स्पंदन
मुझे डराने लगा है....
______________________
अस्तित्व
मैंने सोचा था,
वह एक बूँद है....
गिरकर पलकों से
ज़मीन में कहीं खो जाएगा....
मैं गलत था...!
वह एक बूँद का सागर
फैला है दिगंत तक
मेरे सम्मुख....
उसे पार करना
मेरे वश का नहीं,
और डूबने का सलीका
मैं सीख न सका.....!!
______________________
भ्रम
दर्द की टहनी से
बिछड आये पत्ते ने
पलकों पर दस्तक दी...
देखा....
चेहरे पर
बेइंतहा ज़र्दी के बीच
चंद हरियाले से छींटे...
यह क्या...!!!
मैंने आँखें मलकर
दोबारा देखा...
कहीं मेरे सामने कोई
आईना तो नहीं....
______________________
विरह
मेरे दोस्त...
मेरी राहे हयात से
क्यूँ समेट ली तुमने
अपनी यादों की धूप...??
देख..!
मेरे लफ़्ज़ों की तरह
मेरी रूह भी ठिठुरी जाती है....
______________________








