Sunday, October 23, 2011

दीप छंद - १

कुण्डलिया

(१)
काली रातों में खिले, दीपक बन के फूल
उजियारे रत खोज में, अंधियारे का मूल
अंधियारे का मूल, कहाँ स्थित जीवन में
आओ हम तुम बैठ, तलाशें अपने मन में
यही पर्व का पाठ, करें सुख की रखवाली
मन का दीपक बार, कहाँ फिर राहें काली.

(२) 
कितने कितने कर जुड़े, उमड़े कितने दीप 
कितना बिखरा नेह है, कितने भाव प्रदीप
कितने भाव प्रदीप, जुड़े उर से उर सबके 
और मनाएं पर्व, सभी हिल मिल कर अबके 
शपथ उठायें चलो, बाँट दें सुख हो जितने
कदम उठे निःशंक, भला दुख होंगे कितने?

(३) 
अपने अपने दीप ले, अपने अपने साज 
एक सभी के राग हों, और मधुर आवाज 
और मधुर आवाज, सभी मिल खुशियाँ गायें 
गैर यहाँ पर कौन, हृदय सभी जगमगायें 
झिलमिल मेरी आँख, सजायें तेरे सपने
मेरे सारे ख्वाब, बना ले तू भी अपने.

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सादर बधाईयाँ
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Wednesday, October 19, 2011

ग़ज़ल

लहरों की मत रफ़्तार देख |
अपने बाजू हर बार देख |

थमने की बातें भी न सोच,
ठहरा है कब संसार देख |

रिश्तों में प्रीत रही न आज,
चलता है सब व्यापार देख |

करता है ऐश लूट कर मुल्क,
तिहाड़ में खुश गद्दार देख |

हत्यारे यां रहें बा चैन,
लीला यह अपरम्पार देख |

भूखे मेहनतकश ! धिक्कार!
मौज में सब गुनहगार देख |

चुभते से प्रश्न कभी न पूछ,
हबीब है कब अधिकार देख |


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"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

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