Wednesday, October 19, 2011

ग़ज़ल

लहरों की मत रफ़्तार देख |
अपने बाजू हर बार देख |

थमने की बातें भी न सोच,
ठहरा है कब संसार देख |

रिश्तों में प्रीत रही न आज,
चलता है सब व्यापार देख |

करता है ऐश लूट कर मुल्क,
तिहाड़ में खुश गद्दार देख |

हत्यारे यां रहें बा चैन,
लीला यह अपरम्पार देख |

भूखे मेहनतकश ! धिक्कार!
मौज में सब गुनहगार देख |

चुभते से प्रश्न कभी न पूछ,
हबीब है कब अधिकार देख |


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Sunday, October 16, 2011

आभार (100)

भी स्नेहिल सुधि स्वजनों का सादर अभिनन्दन.... आप सभी शुभचिंतकों के मार्गदर्शन और स्नेह की छाया में चलता/सीखता/अनुभव और स्नेह प्राप्त करता/  एहसासात... अनकहे लफ्ज़  का यह शतकीय १०० वां पोस्ट है... आदरणीय मित्रों, बीते १५ महीनों का अनुभव वैसा ही मधुर रहा है जैसे परिवार के साथ कोई मनमोहक और अविस्मरनीय यात्रा...  सचमुच! एक परिवार ही तो है यह ब्लॉग जगत... परिवार... जहां भाई हैं, बहन हैं, मित्र हैं, गुरु/शिक्षक हैं, सद्भावना है, स्नेह है, विश्वास है, एहसास हैं, आशा है, हर्ष है, विमर्श है और उत्कर्ष है.... आप सबसे प्राप्त अपार स्नेह  और मार्गदर्शन के लिए सादर आभार व्यक्त करते, जाने अनजाने हुई गलतियों/भूलों के लिए क्षमा याचना करते आप सब से अपने इस नादान  'हबीब' को अपने स्नेहाधीन बनाए रखने के सादर विनम्र निवेदन के साथ यह (१००) पोस्ट आप सब को नमितनयन सविनय समर्पित है.... आभार.

आपकी सदभावनाएँ, संग मेरे सदा आयें
फिर ठहर जीवन डगर पर, सूर सम सद्पथ दिखायें...
आपकी सदभावनाएँ...

मैं सुभागी आज बनकर
मुस्कुराता सुख मनाऊँ
और अम्बर की ऊँचाई
पंख बिन ही लांघ आऊँ 
आपके शत सदवचन भी
बनके उडुगन जगमगाते 
और अमृतमय शुभाशीष
मुझ अकिंचन पर लुटाते 
आपसे सदप्रेरणा पा
यह बटोही चलता जाए....
आपकी सदभावनाएँ, संग मेरे सदा आयें
फिर ठहर जीवन डगर पर, सूर सम सद्पथ दिखायें...

क्या कहूं कि क्या मिला है
बन सुमन यह मन खिला है
और अक्षय मित्रता की
वल्लरी को बल मिला है 
बन के निर्झर जिन्दगी भर 
नेह की बरसाए धारा
और सौरभमय धरा पर 
लिखता जाए गीत प्यारा 
आपसे शीतलता पाकर 
'हबीब' नद सा बहता जाए...
आपकी सदभावनाएँ, संग मेरे सदा आयें
फिर ठहर जीवन डगर पर, सूर सम सद्पथ दिखायें...

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सादर आभार... नमन....
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Thursday, October 13, 2011

ग़ज़ल (जगजीत की याद में)


दो बूँद लुडक आये पलकों से कपोलों तक |
कि गर्दे याद छायी चलती चलि मीलों तक | 

हम आसमां को देने आये  थे मस्त मौसम, 
के चाँद उतर आया चल के यहाँ शोलों तक |

सब ढूंढ ही रहे थे चारा-ए-गमे दिल को,
मरहम वो दे भी आया जलते से फफोलों तक |

इक आग जैसे था वो जलता  रहा उमर भर,
कि सुर्खी फ़ैल आयी दीदा-ए-अकीलों तक |

'हबीब' रूह है पुरनम भीगा है ये जहां भी,
अश्कों की फ़ौज छायी समंदर-ओ-साहिलों तक |

 

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 विनम्र श्रद्धांजली 
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"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

एक नज़र इधर भी...