Thursday, October 13, 2011

ग़ज़ल (जगजीत की याद में)


दो बूँद लुडक आये पलकों से कपोलों तक |
कि गर्दे याद छायी चलती चलि मीलों तक | 

हम आसमां को देने आये  थे मस्त मौसम, 
के चाँद उतर आया चल के यहाँ शोलों तक |

सब ढूंढ ही रहे थे चारा-ए-गमे दिल को,
मरहम वो दे भी आया जलते से फफोलों तक |

इक आग जैसे था वो जलता  रहा उमर भर,
कि सुर्खी फ़ैल आयी दीदा-ए-अकीलों तक |

'हबीब' रूह है पुरनम भीगा है ये जहां भी,
अश्कों की फ़ौज छायी समंदर-ओ-साहिलों तक |

 

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 विनम्र श्रद्धांजली 
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Sunday, October 9, 2011

"निःश्वांस"

वक़्त खेल रहा है 
समुद्र की लहरों के साथ...
पल में उसे उछालता 
आसमान में,
जैसे एक काबिल खिलाड़ी 
उछाल देता है फुटबाल को....

सागर तट पर बैठा...
तुझे सोचता...
देखता रहा उसी ओर,
जिस ओर तुम गयी हो... अभी अभी...
तट की भीगी मुलायम रेत पर 
चमकते तुम्हारे कोमल पैरों के 
खुबसूरत छाप...
मुस्कुराते हुए से लगते हैं...
मानो वादा कर रहे हों, 
क्षनान्तर में लौट आने का...

तभी अचानक...!!
वक़्त के पैरों उछाली जाकर,
लहरें... तट पर आन गिरी...
और पल भर में लौट गईं...
वक़्त के पैरों की ओर...
फिर से उछाल दिए जाने के लिए...
लेकिन... जाते हुए...
मुस्कुरा कर...  
क्षनान्तर में लौट आने का...
वादा सी करती 
तुम्हारे पैरों की,
कोमल, सुन्दर छाप भी,
ले गयी अपने साथ....

आह...!!
तट की भीगी रेत 
अब एकदम सपाट हो चली है...
एक गहरे निःश्वांस की तरह...
और वक़्त...??
वह मशगुल है...
अपने खेल में अभी भी... 

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"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

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