दो बूँद लुडक आये पलकों से कपोलों तक |
कि गर्दे याद छायी चलती चलि मीलों तक |
हम आसमां को देने आये थे मस्त मौसम,
के चाँद उतर आया चल के यहाँ शोलों तक |
सब ढूंढ ही रहे थे चारा-ए-गमे दिल को,
मरहम वो दे भी आया जलते से फफोलों तक |
इक आग जैसे था वो जलता रहा उमर भर,
कि सुर्खी फ़ैल आयी दीदा-ए-अकीलों तक |
'हबीब' रूह है पुरनम भीगा है ये जहां भी,
अश्कों की फ़ौज छायी समंदर-ओ-साहिलों तक |
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विनम्र श्रद्धांजली
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