Saturday, August 6, 2011

"गगन उठा लो"

पंचम सुर में जम के गा लो.
आंसू पी लो गम को खा लो.

चूभ गए न टूट आँखों में,
किसने कहा कि सपने पालो.

तुम तो भूखे प्यासे तड़पो!
उनकी सेहत भालो - भालो?

जिनकी नियत ही खोटी है,
उनसे कहो कि आप विदा लो.

आज पहाड़ों से टकराओ,
जीतो अपनी राह सजा लो.

दर्द बसे हैं जो सीनों में,
उन्हें मशाले मिस्र बना लो.

बहुत हुआ हबीब अब चीखो,
चीखो सर पे गगन उठा लो.

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Thursday, August 4, 2011

स्वीकारोक्ति - 2

म्माननीय मित्रों को सादर नमस्कार.... आज एक पुरानी कविता प्रस्तुत है जिसकी रचना लगभग साल भर पहले तब हुई थी जब एक दिन समाचारों ने  अनायास ही अनेक चेहरों का  पाखंड अनावृत कर दिया  था... तब आश्चर्य, आक्रोश और ग्लानि घनीभूत होकर शब्दों में ढल गए थे.... स्वीकारोक्ति...

आईने तुझ तक आऊँ कैसे?
अपना रूप दिखाऊँ कैसे?
अंतरात्मा की आँखों से 
आँखें भला मिलाऊँ कैसे? 


आज दुह्शाशन बन कर फिरता,
जाने कितनी चीरें हरता,
मैं ढोंगी कामी और लम्पट 
आदर्शों की बातें करता 
दुष्कर्मों को चाहे ढँक लूं 
अंतर को समझाऊँ कैसे? 


जाने क्या इस नश्वर तन में,
जिसे बसाया सबने मन में,
अन्धकार का इक दरिया खुद 
भटक रहा प्रश्नों के वन में 
खुद ही राह न पाऊँ सबको 
कोई राह सुझाऊं कैसे? 


शब्द मेरे मुझ पर ही हँसते 
सच्चाई बन विषधर डसते
डोली सपनों की नयनों में 
उजड़े फिर फिर बसते बसते 
काँटों की झाडी मन मेरा 
गीत मधुर तब गाऊँ कैसे? 


झूठ पे सच की खाल चढ़ाकर 
मधुर शब्दों की जाल बनाकर 
भावनाओं के संग मैं खेलूं 
मानवता व्यापार बनाकर 
प्रथम नियम बाजारवाद का 
वेश असल दिखलाऊँ कैसे?

अंतरात्मा की आँखों से 
आँखें भला मिलाऊँ कैसे? 


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Sunday, July 31, 2011

"राहें हैं बारूद भरी..."

सभी सुधीजनों को सादर नमस्कार... महफिले दानां में यह नादां हबीब एक नयी ग़ज़ल के साथ पेशे खिदमत है... मुताअला फरमाएं... "राहें हैं बारूद भरी..."


किसकी बात करूँ यारा.
कितनी बार मरुँ यारा.

राहें हैं बारूद भरी,
चलते हुए डरूँ यारा. 

सांप ही नहीं मरता है, 
कितना वार करूँ यारा.

कितने हैं ज़ख्मात हरे,
बन कर पीर झरूँ यारा.

जो कह दूं बिंदास कहूं,
छुप ना बात करूँ यारा.

सफ़र 'हबीब' अभी लंबा, 
कैसे मैं ठहरूँ यारा. 


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"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

एक नज़र इधर भी...