Tuesday, May 3, 2011

"लादेन सुपुर्द-ए-आब"

अमेरिका ने आक्रान्ता को दीगर मुल्क में घुस कर मार गिराया...


हम हत्यारों को क़ैद कर के भी पाल रहे हैं... क्यों??


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जश्न है अमेरिका में, लादेन सुपुर्दे आब।
खौफ मचा कर हिंद में, ज़िंदा अफजल-कसाब॥

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बैठे, खाए ऐश में, जैसे हों दामाद।
रईयत को हक भी नहीं, करने की फ़रियाद॥

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अधिवक्ता मिल गए इन्हें, कैसे भाई जान ?
कौन इनके करमों से, बन बैठा अनजान ??
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इन्हें बचा कर हासिल क्या, होगा बड़ा सवाल ?
गद्दारों की पैरवी पर, मचता नहीं बवाल॥
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जाने कित्ता खींचेगा, केस नहीं है साफ़।

खुशकिस्मती शहीदों की, अगर मिला इन्साफ॥
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हिंद के हत्यारे, सज़ा न पायेंगे क्या रे?

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Saturday, April 30, 2011

"श्रमवीरों को सादर नमन"

समस्त आदरणीय स्नेही मित्रों को सादर नमस्कार.... १ मई, अंतर्राष्ट्रीय श्रम दिवस पर दुनिया के तमाम श्रमवीरों को सलाम... नमन ओर अभिनन्दन सहित सादर कुछ क्षणिकाएं समर्पित है....
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उसके काँधें पर
रखा सूरज
सारा दिन
उसके पसीने में
भीगता रहा,
और आखिरकार
बुझ गया....
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जा छिपा
क्षितिज की ओट में
फिर से
अपनी आग जलाने.... !!
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अपने पैरों की रगड़ से
पत्थरों के जिस्म में
उभर आये
छालों को,
उसने पसीने से तर
अपने हाथों से सहलाया...
चमक्तार हो गया...
एक सुन्दर सा आशियाना
तैयार हो गया...
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आशियाना....
जो उसका अपना नहीं था...!!
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उसके हाथों में
रंगों की बाल्टियां
ओर मुलायम कूचियाँ
दे कर कहा गया-
दरो- दीवार से
अपने पसीने के निशान मिटा दे !!
वह अपने काम में लग गया
मुस्कुराता हुआ ...
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मुस्कुराता हुआ....!!
क्योंकि वह जानता है,
बुनियाद पर से
उसके पसीने के निशान
दुनिया के तमाम रंग
मिलकर भी नहीं मिटा सकते... ।
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वह...
जिसने पर्वतों को
धकेल कर रास्ता बनाया है,
पत्थरों को पिघलाया है,
दरिया बहाया है,
जिसके दम से-
समय का पहिया घूमता है,
ज़मीन उठ कर
आसमान को चूमता है...
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उसके टूटे दरवाज़े पर
कभी सुबह की दस्तक नहीं होती,
उसके घर से रात-
कभी रुखसत नहीं होती,
उसकी आँखों का समंदर सूखा है...
उसकी झोपडी का चुल्हा
अज़ल से भूखा है... !!
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"श्रमवीरों को सादर नमन"

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"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

एक नज़र इधर भी...