Friday, April 15, 2011

"ये ज़हां अजायबखाना है"

"जब स्मृतियों के पुष्प महकते हैं, सदियों के पाँव सरकते है।

सुगत की कंदराओं में तब, कुछ प्यारे से जुगनू चमकते हैं॥


.... और सदियों के सरकते पांवों ने आपके इस नादान हबीब को भी कुछ पीछे सरका दिया.... शैशव की ओर.... जहां प्यारे प्यारे जुगनुओं की झिलमिलाती रोशनी में नज़र आती है मेरी बहुत खुबसूरत, प्यारी सी दादी... जो मेरे साथ खेलती, खिलती, खिलखिलाती है... छोटी छोटी रोचक शिक्षा से जीवन का आधार बनाती है.... वे बहुधा अपनी गोद में लेकर मुझे मीरा, कबीर, सूर, रहीम और बुल्हे के पद सुनाया करती थीं... ज्ञात नहीं कि यह ऐसी ही किसी गीत की पंक्ति है या उनका अपना फलसफा, पर एक पंक्ति वे तकियाक़लाम की तरह उपयोग में लाती थीं - "ये दुनिया अजायबखाना है..." ...आज इसी पंक्ति की बुनियाद लेकर गीत बनाने की इच्छा हुई तो पाया... गीत में उनका दर्शन घुलता चला आया...... महफिले दानां में सादर यह गीत प्रस्तुत है... "ये ज़हां अजायबखाना है"


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क्षण भर का मीत ज़माना है, ये ज़हां अजायबखाना है।


है मस्त यहाँ वो ही प्यारे, जिसने इस सच को जाना है॥


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सुख-दुःख तो बादल हैं जैसे, ये बरसे ना, ये हो कैसे ?


अंतरतम तो भीग चले, ये बरसें तो बरसें ऐसे,


पर ठहरे कब ये दो भी पल, हैं आज यहाँ, कहीं और हैं कल


जीवन के अम्बर में इनको, बस आना हैऔर जाना है।


है मस्त यहाँ वो ही प्यारे, जिसने इस सच को जाना है॥


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खिलते हैं पुष्प बिखर जाते, बिखरे तो फिर जीवन पाते,


जीवन मृत्यु के खेले में, हम आते हैं और हैं जाते,


साँसों का चन्द ये रेला है, बस चार दिनों का मेला है,


किसको कितनी साँसें लिखनी, है इसका कौन ठिकाना है?


है मस्त यहाँ वो ही प्यारे, जिसने इस सच को जाना है॥


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जो हैं तेरे वो कब तेरे, सब हैं केवल भ्रम के घेरे,


यह परम सत्य जो पहचाने, वो भूल चले तेरे मेरे,


बस एक निमित्त है जीवन का, बोयें हम बीज अपनेपन का,


इक लक्ष्य बड़ा पावन सा है, जिसको हम सब को पाना है।


है मस्त यहाँ वो ही प्यारे, जिसने इस सच को जाना है॥


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क्षण भर का मीत ज़माना है, ये ज़हां अजायबखाना है


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Tuesday, April 12, 2011

"१३ अप्रेल १९१९...अज्ञात शहीदों के नाम - प्रणाम"

सभी सम्माननीय मितरां नू बैसाखी दी लख लख बधाईयाँ... बैसाखी कहते ही उत्साह और उमंग का रंग बिरंगी, खुशियों से लबरेज़ उन्मुक्त वातावरण नज़रों में आ जाता है, पर साथ ही बिम्बित हो उठता है इतिहास की एक अत्यंत लोमहर्षक घटना जिसकी कल्पना मात्र ही आज भी रोंगटे खड़े कर देती हैं... मुट्ठियाँ भींच जाती हैं... पलकों का बाँध अक्षम साबित होने लगता है....

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"वह अप्रेल की चौदह तारीख थी। भयभीत सा दिन निकला, सिहरते सूर्य की कांपती किरने वहाँ झाँकने लगीं। देखा, सारा मैदान घायलों और मृतकों से भरा हुआ था। घायलों का रूदन माहौल को अत्यंत कारुणिक बना रहा था। आसपास खड़े थे आतंक से सिकुड़ते, ज़र्द चेहरा लिए छोटे- बड़े वृक्ष... खामोश.... आखिर वे कल शाम हुए भारतीय इतिहास के सबसे खौफनाक कत्लेआम की साक्षी जो थे...."

इतिहास सुना रहा था मुझे १३ अप्रेल १९१९ को हुए उस भयानक हत्याकांड का विवरण, जिसे देखने और बर्दाश्त करने के लिए वह मजबूर था- "कल शाम की ही तो बात है। अमृतसर का वक्षस्थल जलियांवाला बाग़ २५ हजार हिन्दुस्तानियों की उत्साह पूर्ण उपस्थिति से मानो झूम रहा था। वो हुकूमते बर्तानिया ने रोलेट बिल लागू कर दिया था ना, उसी का विरोध करने के लिए एक सभा आयोजित थी वहाँ। तब ऐसे भीषण परिणाम की कल्पना भी किसी ने नहीं की रही होगी। हंसराज नामक स्वंतंत्रता सेनानी सभा को संबोधित कर रहा था कि उसी वक़्त भारी भरकम बूटों की टापों से वातावरण दहल उठा। मैंने देखा- बाग़ के संकरे द्वार से होकर अंग्रेज सिपाही अर्धवृत्त में फ़ैल गए; और कोई कुछ समझ पाता इससे पहले ही अंग्रेज जनरल क्रूरता पूर्वक दहाड़ उठा- फायर.....!!!"

हे इश्वर!! बर्दाश्त नहीं हुआ मुझसे। अपनी तर्जनी रख दी मैंने इतिहास के सर्द होंठों पर। इतिहास को चुप तो करा दिया परन्तु अपने विचारों को कैसे बांधता? कल्पना में देखने लगा जान बचाने के प्रयास में दीवार फांदते हुए गोलियों की बौछारों से छलनी होकर धरासायी होते, जिस्म को बन्दूकी शोलों से बचाने के लिए सूखे कुएं में कूदकर समाधिस्थ होते तथा प्राण रक्षा के लिए इधर उधर भागते अपने ही भाईयों बहनों के क़दमों तले कुचल कर जान गंवाते अपने निर्दोष, निसहाय भाईयों बहनों को। रोंगटे खड़े हो गए... सुनाई पड़ने लगी उनकी मार्मिक चीखें... उफ... !! अनायास ही मेरे हाथों ने मेरे कानों को ढँक लिया।

"करीब आठ - दस मिनट तांडव करने के पश्चात...", इतिहास पुनः बताने लगा- "मौत का वह काफिला ऐसे लौट चला जैसे कुछ हुआ ही ना हो। और सचमुच कुछ भी तो नहीं था यह उनके लिए। जैसा कि जनरल डायर ने बाद में जांच कमेटी के आगे कहा था- 'मुझे खेद है कि मेरे पास १६०० कारतूस ही थे, वरना मैं और भी गोलिया चलवाता...." क्यों? हंटर कमेटी के प्रश्न पर क्रूरतापूर्वक बोला था वह ज़ालिम- " मैं इतनी गोलियां चलवा देना चाहता था कि फिर हमें गोलियां चलाने की आवश्यकता ही न पड़े...... और उधर.... गोलियों से छलनी असहाय लोग तडपते रहे। सहायता पहुंचाना तो दूर सारी रात कोई उन्हें पूछने वाला भी नहीं था। कोई यदि उनके पास थे तो बस सिसकते, सहमें से ये पौधे..... ।"

बस... बस... मुझमें आगे सुनने की शक्ति ना रही। मैंने पुनः अपनी तर्जनी इतिहास के धवल केशों से ढंके होठों पर रख दी। तब मेरे आंसुओ से तर चेहरे को अपने झुर्रीदार हाथों में लेकर प्यार से वह कहने लगे- "मेरे बच्चे, ऐसे ही अनेकानेक बर्बर जख्मों से मेरा पूरा जिस्म भरा हुआ है... लेकिन मेरे बच्चे मेरे जिस्म के ये सिसकते ज़ख्म ही तुम्हारी घरोहर हैं.... । बेशक इनकी दुखदायी सूरतें तुम्हारे अक्स को अश्कों से भिगो सकती हैं, लेकिन यही तुम्हें राह भी दिखाएंगी, बातायेंगी कि किस कीमत पर हासिल हुई है तुम्हें यह आज़ादी... । आओ पुत्र उन अमर अज्ञात शहीदों के लिए इश्वर से दुआ मांगे...."

और मैंने देखा - वे घुटनों के बल बैठ गए, माथे से ज़मीन को छुआ, सीने पर क्रास बनाया, थोड़ी मिट्टी हाथों में लेकर चूमा, उसे माथे से लगाया तथा दोनों आँख बंद कर हाथ उठा कर दुआ मांगने लगे। मित्रों, आईये दो क्षण हम भी उनका अनुशरण करें....

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"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

एक नज़र इधर भी...