Sunday, January 30, 2011

'वर्तमान की पाती'

मस्त स्नेही और सुधि मित्रों को सादर नमस्कार.... । इन दिनों अत्यधिक व्यस्तता ब्लॉग पठन और लेखन में अवरोध का कारण बना हुआ है। आप सभी स्नेही जनों से उपस्थिति में कमी हेतु क्षमा के साथ मुझ पर अपना स्नेह आवरण यथावत बनाए रखने का निवेदन ..... । मित्रों, जनवरी का अंतिम सप्ताह सुभास चन्द्र बोस की जयन्ती, गणतन्त दिवस और बापू के महाप्रयान को स्मरण करा कर बीतने को है। गणतंत्र के इन दो पुरोधाओं को यह पोस्ट 'वर्तमान की पाती' समर्पित है....
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राष्ट्र के गगन तुम्हें है मेरा सदनमन।
पर देख कैसे सूख रहा तेरा ये चमन।।
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दी हमें स्वतन्त्रता कुर्बान हो गए,
शान्ति की धरा के आसमान हो गए,
लिख समय पटल पे हिंद की अमिट कथा,
राष्ट्र अस्मिता के तुम उत्थान हो गए।
याद कर तुम्हें सजल हैं मेरे दो नयन॥
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स्वप्न देख कर गए जो दिव्य हिंद का
हाल बुरा हो रहा है भव्य हिंद का
बेच बेच देश रख रहे हैं नेतागण
स्विटज़ बेंक में तमाम द्रव्य हिंद का।
राष्ट्र को निगल रहा है लोभ का व्यसन॥
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आज जिनके हाथों में देश की कमान,
क्षमता शून्य हैं, चलाये सिर्फ शब्दबाण,
घिर रही घटा सघन आतंकवाद की,
हर ह्रदय में लहरे भय की लेती हैं उफान।
पुण्य धरा में है आज हिंसा और घुटन॥
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मुफलिसी की मार से दुखी हैं जन अपार,
दैत्य मंहगाई का किये जाता बंठाधार,
छोटा लग रहा है शिखर हिमगिरी का भी
द्रुत गति से आज गगनमुखी भ्रष्टाचार ।
एक पक्ष और विपक्ष का है अंतर्मन॥
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देख कैसे सूख रहा तेरा ये चमन।।
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Tuesday, January 25, 2011

"हेप्पी रिपब्लिक डे"

रेड ग्राउंड से वापस आते हुए मैंने उसे देखा... सड़क किनारे सिर झुकाए बैठा था. निकट ही बड़ी सी गठरी रखी थी. मैं बगल में बैठ गया, धीरे से कंधे पे हाथ रखा तो उसने चौंक कर सिर उठाया.... यह क्या...? मैंने कहा- "आज के दिन आपकी आँखों में उदासी? और आप यहाँ क्यूँ बैठे हैं? भीतर मैंने काफी तलाश किया आपको, आप भीतर क्यूँ नहीं आये?"
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आना तो चाहता था भीतर, उसने बुझे स्वर में कहा,- पर सुरक्षा में लगे जवान ने बाहर ही रोक दिया।
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मुझे ताज्जुब हुआ- "आपको रोक दिया... आपने बताया नहीं ये सारा उत्सव आपके ही जन्मदिन का है?"
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"बताया था" पर वह बोला- "बिना पास के अन्दर नहीं जा सकते। मैंने तो यह भी कहा कि मेरे आने की सुचना महामहिम को दे दो, तो बोला मैं महामहिम तक नहीं जा सकता, अपने अफसर को बता सकता हूँ, फिर वह अपने अफसर को बतायेगा, फिर उसका अफसर अपने अफसर को, फिर वह अपने... और जब तक सुचना वापस बाहर आयेगी यह उत्सव ही ख़त्म हो गया होगा... फिर भीतर जा कर क्या करोगे? पास है तो दिखाओ वरना किनारे हटो, माथा मत खाओ... कहकर उसने मुझे इधर धकेल दिया... चलते चलते थक गया था सो बैठ गया..." कहता हुआ वह धीरे से खडा हुआ और बोला "तुम थोड़ी मदद करो, यह गठरी मेरे सिर में रख दो तो अपने रास्ते जाऊं..."
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"मैंने पूछा -"पर बाबा इस गठरी में है क्या... और आप जाओगे कहाँ?
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उसने धीरे से कहा- " हाँ... इस गठरी में शुभकामनाएं हैं, जो लोगों ने एक दुसरे को मेरे नाम से दिया था... मुझे रास्ते में पड़े मिले तो उठा लिया है... शुभकामनाएं व्यर्थ नहीं होनी चाहिए ना.... और कहाँ जाऊंगा यह तो मुझे भी नहीं मालूम...."
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मैंने खामोशी से गठरी उठाने में उसकी मदद की, वह झुके कंधे पर शुभकामनाओं की गठरी लिए, लाठी टेकता धीरे धीरे चला गया.... पीछे से मैनें "गणतंत्र बाबा" को जन्मदिन मुबारक कहा और जल्दी से गाडी उठाकर चल पडा.... छुट्टी का दिन... बच्चे को कहीं पिकनिक पर ले जाने का वादा जो पूरा करना था.... ।
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"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

एक नज़र इधर भी...