Sunday, November 28, 2010

"इक रोटी के अनगिन टुकड़े"

सभी सम्माननीय, स्नेही मित्रों को सादर नमस्कार... परम आदरणीय ब्लोगर, बड़े भईया महेंद्र मिश्र ने अपने ब्लॉग 'समय चक्र' के ३४७ वीं पोस्ट में सुश्री उर्मिला मेहता जी के व्यंग्य आलेख और उसमें दी गयी कविता रचने हेतु आवश्यक रोचक रेसिपी का सोदाहरण उल्लेख किया है। उस रोचक रेसिपी पर विचार और प्रयोग करते करते कुछ शेर कहना प्रारंभ किया और कहते कहते हास्य से दूर ले जाती यह सामयिक और वैचारिक ग़ज़ल बन पडी। नादान हबीब का यह प्रयोगधर्म महफिले दानां में पेशे खिदमत है .... "इक रोटी के अनगिन टुकड़े"
इक रोटी के अनगिन टुकड़े।
हर टुकड़ों के अपने दुखड़े।
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जाने कितना गहरा धंसा है,
भ्रष्टाचार के पाँव न उखड़े।
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ख़्वाबों को ओढ़े बैठा वह,
जैसे चिंदी चिंदी कपडे।
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स्वक्छ प्रशासन का वादा कर,
करते जाते हैं वे लफड़े।
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सच्चाई का वक़्त बुरा है,
झूठ के आगे नाक वो रगड़े।
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सीधा सादा जीवन चांहू,
पर आते पचड़े पर पचड़े।
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चलो बहायें दरिया -ए-उल्फत,
छोड़ 'हबीब' आपस के झगडे।
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Thursday, November 25, 2010

२६/११

एक पतली नदी
आँखों से
मंथर बहती,
समूचा भिगोती,
समाती रही
अंतर में बूंद - बूंद...

भीगा अंतर
कुछ हलचलों का गवाह बना...
'वे' दौड़ते चले गए,
बहते लावों के ऊपर से
बंद कर दिया
अपना फौलादी सीना रखकर
धधकती ज्वालामुखी का मुंह...
अब...
जमे हुए लावों पर
अंकित हैं, कुछ -
पैरों के निशान...

पैरों के निशान ....
जो हैं तो अजनबी ....
पर पहचाने से लगते हैं...
श्रद्धा जगाते हैं...
मुक़द्दस सा एहसास
मन में भर जाते हैं....

***********श्रद्धांजली *************





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