सुधि मित्रों को सादर नमस्कार और श्री कृष्ण जन्मोत्सव की भक्तिपूर्ण बधाइयां।
श्री कृष्ण का नाम पूर्णता का एहसास है,
सुख का सागर है चिर - मधुमास है।
धरती हैं, पाताल है, अन्तरिक्ष है आकाश है।
जल है, वायु है, विस्तार है, विकास है॥
छांव है, धूप है, प्रतिबिम्ब है, प्रकाश है।
गीत है, संगीत है, आनंद है, उल्लास है॥
काम है, निष्काम है, अध्ययन है, अभ्यास है।
वृक्ष है, फल है, पुष्प है, सुवास है॥
आदि है, अनंत है, अजन्मा है, अनाश है।
ब्रह्म है, ब्रह्माण्ड है, शिव है, कैलास है॥
मीरा की पूजा है, राधा का विश्वास है।
सुदामा का संबल है, कष्टों का प्रणाश है॥
दीपक है, ज्योती है, श्रद्धा है, उपवास है,
प्रेम है, विरह है, मिलन है, महारास है॥
ऐसे पूर्णकाम भगवान् श्री कृष्ण के चरणों में मुझ अकिंचन का श्रद्धा-सुमन स्वरुप यह पोस्ट समर्पित है....
जिनके हैं धरती अम्बर, जो जग का आधार।
आवाहन गोपाल का, फिर प्रगटो पालनहार॥
छम- छम कर फिर डोलिए, मन के बृज नंदलाल।
नैन बिछाए राह में, हम बन ग्वालन - ग्वाल॥
जी चाहे फिर देखना, लीला वह चितचोर।
कंकर मटकी फोड़ना, गलियन में भय भोर॥
गोकुल की गलियाँ बनी, कंस की क्रीडागार।
व्याकुल जन की पीर हरो, हो कर फिर साकार॥
गूंजे 'कलि' आकाश में, गीता पावन श्लोक।
कलि, द्वापर कर दो प्रभु, फैले ज्ञानालोक॥
द्वार सुदामा खड़ा हुआ, लिए नैन विश्वास।
भक्त की सुधि लो प्रभु, पूरी कर दो आस॥
--------------------- जय श्री कृष्ण -------------------------
श्री कृष्ण का नाम पूर्णता का एहसास है,
सुख का सागर है चिर - मधुमास है।
धरती हैं, पाताल है, अन्तरिक्ष है आकाश है।
जल है, वायु है, विस्तार है, विकास है॥
छांव है, धूप है, प्रतिबिम्ब है, प्रकाश है।
गीत है, संगीत है, आनंद है, उल्लास है॥
काम है, निष्काम है, अध्ययन है, अभ्यास है।
वृक्ष है, फल है, पुष्प है, सुवास है॥
आदि है, अनंत है, अजन्मा है, अनाश है।
ब्रह्म है, ब्रह्माण्ड है, शिव है, कैलास है॥
मीरा की पूजा है, राधा का विश्वास है।
सुदामा का संबल है, कष्टों का प्रणाश है॥
दीपक है, ज्योती है, श्रद्धा है, उपवास है,
प्रेम है, विरह है, मिलन है, महारास है॥
ऐसे पूर्णकाम भगवान् श्री कृष्ण के चरणों में मुझ अकिंचन का श्रद्धा-सुमन स्वरुप यह पोस्ट समर्पित है....
जिनके हैं धरती अम्बर, जो जग का आधार।
आवाहन गोपाल का, फिर प्रगटो पालनहार॥
छम- छम कर फिर डोलिए, मन के बृज नंदलाल।
नैन बिछाए राह में, हम बन ग्वालन - ग्वाल॥
जी चाहे फिर देखना, लीला वह चितचोर।
कंकर मटकी फोड़ना, गलियन में भय भोर॥
गोकुल की गलियाँ बनी, कंस की क्रीडागार।
व्याकुल जन की पीर हरो, हो कर फिर साकार॥
गूंजे 'कलि' आकाश में, गीता पावन श्लोक।
कलि, द्वापर कर दो प्रभु, फैले ज्ञानालोक॥
द्वार सुदामा खड़ा हुआ, लिए नैन विश्वास।
भक्त की सुधि लो प्रभु, पूरी कर दो आस॥
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