Friday, July 9, 2010

भाजपाई बंद भारत कर कर खिसियाये

सुधि मित्रों, मेरा सादर नमस्कार स्वीकार करें,
मैं अत्यंत आभारी हूँ की आप सब ने मेरी भावनाओं से इत्तेफाक रखते हुए मुझ अकिंचन को अपने स्नेह का भागी बनाया। कोई रचना जब हमें अपने ह्रदय के निकट जान पड़ती है तो निश्चित रूप से हम अपनी प्रतिक्रिया में अपने सर्वोत्तम भावों को अंकित करते हैं। मेरी रचना "'शहीद कब वतन..." पर आपकी प्रत्येक टिप्पणी इस तथ्य को संवेदनशीलता के साथ उजागर कारती हुई मेरे ह्रदय के निकट स्पंदित हो रही हैं। अपनी रचना में प्रयुक्त उर्दू लफ़्ज़ों के अर्थ ना देकर अनजाने ही अपने मित्रो के असमंजस का कारण बन जाने के लिए मैं खेद प्रगट करता हूँ तथा भविष्य में इस पक्ष पर सतर्क रहने का विश्वास दिलाता हूँ। आप सभी के स्नेह के सम्मुख नतमस्तक मैं प्रयासरत हूँ कि आपके द्वारा प्रदत्त "स्नेह सम्पदा" की रक्षा कर सकूं।

मित्रों, देश की; जनता की प्रमुखतम एवं दिन प्रतिदिन विकराल होती समस्या पर हास्य व्यंग्य को माध्यम बनाकर, यह इस पोस्ट आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ. शासन-प्रशासन के कथित गंभीर उपायों के बावजूद महंगाई वक़्त-बेवक्त उछल उछल कर हम सभी को लतियाए जा रही है। तमाम दावों से ऊपर की सच्चाई यही है कि "महंगाई" किसी के नियंत्रण में नहीं है और अपना पृथक अस्तित्व बना चुकी है। देश के कण-कण में व्याप्त हो चुकी है। अभी तक मेरा, कदाचित हम सब का मानना रहा है की केवल इश्वर ही कण-कण व्यापी होता है और इस लिहाज से तो महंगाई..... खैर, इस पर नियंत्रण सरकार के बस की बात तो लगता है की है नहीं. आइये हम स्वयं श्रद्धापूर्वक "महंगाई माता" की स्तुति कर उससे नीचे आ जाने की प्रार्थना करते हैं. संभवतः ऐसे ही कुछ सफलता हाथ लग जाए.


॥ महंगाई माता की आरती॥

ॐ जय महंगाई माता, मैया जय महंगाई माता।
तेरी किरपा से घर घर में कष्ट बहुत आता॥ॐ जय महंगाई माता॥

बुलेट ट्रेन के जैसे सरपट, तू ऐसे भागे, मैया तू ऐसे भागे।
तेरी चर्चा कर कर सब जन, सोयें और जागें ॥ॐ जय महंगाई माता॥

मनमोहन की सारी कोशिश व्यर्थ चली जाए, मैया व्यर्थ चली जाए।
भाजपाई बंद भारत कर कर खिसियाये ॥ॐ जय महंगाई माता॥


होम लोन पर ब्याज का दर हर बैंक बढ़ाता है, मैया हर बैंक बढ़ाता है।
ख़त्म कमाई "किश्तों" में फिर, घर क्या आता है ॥ॐ जय महंगाई माता॥

पेट्रोल और डीज़ल तो खुद ही, भभक रहे ऐसे, मैया भभक रहे ऐसे।
गैस की कीमत ही सुन किचन, फुफकारे जैसे ॥ॐ जय महंगाई माता॥

दाल और चावल की दर, सुरसा के मुह जैसे, मैया सुरसा के मुह जैसे।
खाना संभव नहीं बिना, खाए ही जियें कैसे ॥ॐ जय महंगाई माता॥

सब्जी की सूरत देखे ही बीत गए बरसों, मैया बीत गए बरसों।
तेरी कृपा से दाल मगर, खा पाया माँ परसों ॥ॐ जय महंगाई माता॥

हाथ जोर विनती करता मैं, नीचे आ जाओ, मैया नीचे आ जाओ।
पत्नी झोला दे बोली है, राशन ले आओ ॥ॐ जय महंगाई माता॥

"महंगाई माँ" की आरती जो जन प्रेम सहित गाये, मैया प्रेम सहित गाये।
तीनों लोक सुधारे अपना, बेहद सुख पाए ॥ॐ जय महंगाई माता॥

॥इति श्री महंगाई माता स्तुति॥



Saturday, July 3, 2010

"शहीद कब वतन से आदाब मांगता है"

सुधि मित्रों, मेरा सादर नमस्कार स्वीकार करें।
अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रियाएं देकर मेरी हौसला आफजाई करने के लिए आप सभी का बेहद शुक्रगुजार हूँ, और गुजारिश करता हूँ की अपने विचारों की रोशनी को मेरी हमराह बनाए रखकर मेरी राहें रोशन जरुर करते रहें।
पता नहीं ऐसा क्यों होता है की उम्मीदें दम तोड़ जाती हैं, और आशंकाएं अक्सर सच हो जाती हैं। "रोड जाम, आई एम् सेफ एट मैनपुर" को पोस्ट करते वक़्त भी मेरा मन जानी अनजानी आशंकाओं से भरा हुआ था, और शाम होते होते ये जालिम सच भी हो गए जब धौड़ाई से शहादत की खबरें आने लगी। आप सभी की प्रतिक्रियाएं इस बेहद संवेदनशील और सुलगते हुए सवाल पर शासन के उदासीन रवैये को शिद्दत से रेखांकित कर जाती हैं।
मुल्क की रहनुमाई करने वाले सुने - "अगर आप हर आतंकी हमले के बाद निंदा का पिटारा खोल कर बैठ जायेंगे, हमारे शहीदों को दी जाने वाली श्रद्धांजलि और सलामी का निर्वाह केवल परंपरा के रूप में करते रहेंगे और जवाबी कार्यवाही के नाम पर चर्चा और रणनीति निर्धारण का खेल खेलते रहेंगे तो बड़े दुःख के साथ मुझे अपनी यह भावनाएं व्यक्त करनी होगी की आपके द्वारा शहीदों को दी जाने वाली सलामी का कोई सार्थक पहलू दूर दूर तक नजर नहीं आता है।"
अपने इस पोस्ट "शहीद कब वतन से आदाब मांगता है" के साथ अपनी इन्ही भावनाओं को लेकर आपके समक्ष उपस्थित हूँ:-


लहू की बूँद बूँद का हिसाब मांगता है।
शहीद कब वतन से आदाब मांगता है।

पीठ पर जो वार कर रहे हैं मुह छुपाकर
सामना करें अगर वो सामने से आकर,
जमीन से मिला दें, मसल के ही जला दें,
अमनशिआर का जो इताब मांगता है।


हम हैं अमन के हाफ़िज़, कुर्बान भी हो जाएँ,
मरते हुए भी नारा "जयहिंद" का लगाएं,
घडी परीक्षा की है, सर देने का हो जज्बा,
अशफाक का चमन फिर इंक़लाब मांगता

आतंक का भी खर्चा उठा रहे हैं हम तुम,
अफज़ल-कसाब को क्यूँ खिला रहे हैं हम तुम,
भगत, गुरु और सुखदेव् जिस फंदे पर झूले थे,
वह फंदा सियासत से जवाब माँगता है।


वो काटते हैं सर भी, उफ़ भी नहीं है करते,
हम ज़ुल्म की कहानी हैं कागजों में भरते,
मुंसिफ में भी नहीं क्या है फैसले की हिम्मत,
जाने वो और कितना असबाब माँगता है।

कानून मुह छुपाये बैठा है चुप जमी पर,
यह बोझ आ गया है अहबाब अब हमी पर,
आओ कदम बढ़ाएं , खुदी को आजमायें
काफिरों का झुण्ड हमसे अज़ाब माँगता है।

लहू की बूँद बूँद का हिसाब मांगता है।
शहीद कब वतन से आदाब मांगता है।

"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

एक नज़र इधर भी...