Saturday, July 3, 2010

"शहीद कब वतन से आदाब मांगता है"

सुधि मित्रों, मेरा सादर नमस्कार स्वीकार करें।
अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रियाएं देकर मेरी हौसला आफजाई करने के लिए आप सभी का बेहद शुक्रगुजार हूँ, और गुजारिश करता हूँ की अपने विचारों की रोशनी को मेरी हमराह बनाए रखकर मेरी राहें रोशन जरुर करते रहें।
पता नहीं ऐसा क्यों होता है की उम्मीदें दम तोड़ जाती हैं, और आशंकाएं अक्सर सच हो जाती हैं। "रोड जाम, आई एम् सेफ एट मैनपुर" को पोस्ट करते वक़्त भी मेरा मन जानी अनजानी आशंकाओं से भरा हुआ था, और शाम होते होते ये जालिम सच भी हो गए जब धौड़ाई से शहादत की खबरें आने लगी। आप सभी की प्रतिक्रियाएं इस बेहद संवेदनशील और सुलगते हुए सवाल पर शासन के उदासीन रवैये को शिद्दत से रेखांकित कर जाती हैं।
मुल्क की रहनुमाई करने वाले सुने - "अगर आप हर आतंकी हमले के बाद निंदा का पिटारा खोल कर बैठ जायेंगे, हमारे शहीदों को दी जाने वाली श्रद्धांजलि और सलामी का निर्वाह केवल परंपरा के रूप में करते रहेंगे और जवाबी कार्यवाही के नाम पर चर्चा और रणनीति निर्धारण का खेल खेलते रहेंगे तो बड़े दुःख के साथ मुझे अपनी यह भावनाएं व्यक्त करनी होगी की आपके द्वारा शहीदों को दी जाने वाली सलामी का कोई सार्थक पहलू दूर दूर तक नजर नहीं आता है।"
अपने इस पोस्ट "शहीद कब वतन से आदाब मांगता है" के साथ अपनी इन्ही भावनाओं को लेकर आपके समक्ष उपस्थित हूँ:-


लहू की बूँद बूँद का हिसाब मांगता है।
शहीद कब वतन से आदाब मांगता है।

पीठ पर जो वार कर रहे हैं मुह छुपाकर
सामना करें अगर वो सामने से आकर,
जमीन से मिला दें, मसल के ही जला दें,
अमनशिआर का जो इताब मांगता है।


हम हैं अमन के हाफ़िज़, कुर्बान भी हो जाएँ,
मरते हुए भी नारा "जयहिंद" का लगाएं,
घडी परीक्षा की है, सर देने का हो जज्बा,
अशफाक का चमन फिर इंक़लाब मांगता

आतंक का भी खर्चा उठा रहे हैं हम तुम,
अफज़ल-कसाब को क्यूँ खिला रहे हैं हम तुम,
भगत, गुरु और सुखदेव् जिस फंदे पर झूले थे,
वह फंदा सियासत से जवाब माँगता है।


वो काटते हैं सर भी, उफ़ भी नहीं है करते,
हम ज़ुल्म की कहानी हैं कागजों में भरते,
मुंसिफ में भी नहीं क्या है फैसले की हिम्मत,
जाने वो और कितना असबाब माँगता है।

कानून मुह छुपाये बैठा है चुप जमी पर,
यह बोझ आ गया है अहबाब अब हमी पर,
आओ कदम बढ़ाएं , खुदी को आजमायें
काफिरों का झुण्ड हमसे अज़ाब माँगता है।

लहू की बूँद बूँद का हिसाब मांगता है।
शहीद कब वतन से आदाब मांगता है।

Monday, June 28, 2010

"रोड जाम, आई एम् सेफ एट मैनपुर"

2९ जून २०१०,

आज तडके साढ़े चार बजे के आसपास सिरहाने के पास वाइब्रेशन मोड़ में रखे सेल फोन के घुरघुराहट से नींद खुल गई। मिचमिचा कर आँखे मलते हुए देखा तो एक पंक्ति में भेजा गया मेरे मित्र का मेसेज था- "रोड जाम, आई एम् सेफ एट मैनपुर।" यह एक पंक्ति का सन्देश अपने साथ अनगिनत प्रश्नों की भीड़ भी साथ लाया था। भिन्न-भिन्न आकारों के प्रश्न चिह्न मेरे सेल फोन के छोटे से स्क्रीन पर उभरने और विलोपित होने लगे। साथ ही उभरने लगीं दिलकश जंगलों के बीच गुजरने वाली ठंडी, सायेदार सड़कों की तस्वीरें भी, जिनके बीच से गुजरने पर महसूस होने वाले आनंद का बयान करने में हमारे शब्दकोष के तमाम लफ्ज़ बौने और अपर्याप्त लगने लगते हैं। सीटी की तरह बजती हुई सुरीली हवाएं हमें भी व्हिसलिंग का दावत देती हुई अपनी खूबसूरती में खो जाने के लिए मजबूर कर देती हैं। अनायास ही मुझे पांच वर्ष पूर्व मैनपुर के पांच दिवसीय शाशकीय दौरे पर सहकर्मियों और वहां के सीधे-सादे लोगों के साथ व्यतीत वक़्त याद आ गया।

मैनपुर... रायपुर से पूर्व दिशा में लगभग १३५ किमी पर स्थित आदिवासी विकासखंड का मुख्यालय। जैसे ही हम नगरीय तामझाम और चकाचौंध के प्रभाव से मुक्त मैनपुर के गावों में प्रवेश करते हैं, वहां के भोले-भाले लोग, तमाम परिश्थितियों में खुश रहने की उनकी प्रवित्ति इन्तहाई तौर पर प्रभावित करने लगती है। मुझे याद है जब हम मैनपुर से २०-२२ किमी दूर तरेंगा विश्रामगृह पहुंचे तो रात के २ बजे का असुविधाजनक वक्त होने पर भी विश्रामगृह के केयर टेकर ने प्रफुल्ल मन से इलायची वाली कली चाय और बेसन के छोटे छोटे पकौड़ो के साथ हमारा स्वागत किया था। यकीन मानिये, सूखी लकड़ियों को सुलगाकर बनायी हुई धुएं युक्त चाय की चुस्कियों में तब जो आनंद आया था वह हमारे शहरों के बड़े बड़े कैफे और रेस्टारेंट में मिल पाना संभव नहीं। मार्च का अंतिम सप्ताह होने के बावजूद; जब ग्रीष्म काल अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर चूका होता है, वहां का मौसम बेहद सर्द था, और सफ़र की सर्दी दूर भागने के लिए हमें चाय और पकौड़ों के साथ साथ आग का भी सहारा लेना पड़ा था। फिर अलसुबह हम केयर टेकर के साथ मार्निंग वाक् के बहाने घने जंगलों में काफी दूर तक घूमने चले गए थे। वाह... कैसी सुहानी सुबह थी। विभिन्न प्रकार के पक्षियों की भांति भांति की आवाजें वहां की सर्द हवा में घुलकर विलक्षण उत्साह का संचार कर रही थीं। एकदम तरोताजा कर देने वाली हिरणों के झुण्ड की धमाचौकड़ी का आनंद लेने का सुअवसर भी हमें मिल गया था। शहरों के भागमभाग और आपाधापी भरी दुनिया से अलग... एकदम अलग ही दुनिया थी वह।
और आज वही मैनपुर नक्सलवादी आहटों से सहमा हुआ दिखाई पड़ता है। आज पूरे क्षेत्र में एक रहस्यमय खामोशी सुनाई पड़ती है हमारे दिलकश जंगल अब हमें अपनी तरफ खींचते नहीं बल्कि डराते हैं। यहाँ की हरियाली में "लाल छींटे" यत्र तत्र प्रश्न बनकर बिखरे नजर आते हैं। हवाए सुरीली लगने की बजाय फुसफुसा कर सचेत करती हुयी प्रतीत होती हैं। मेरे सेल फोन की स्क्रीन से तमाम तस्वीरें धुंधली पड़कर विलुप्त हो गई। नींद का नामोनिशान न रहा आँखों में। कल शाम ही की तो बात है जब मित्र के देवभोग रवाना होने के पूर्व काफी के साथ हम चर्चा कर रहे थे की आजकल कुछ शान्ति है, और अब यह मेसेज? मैंने हडबडा कर मित्र को फोन किया। उसने बताया की मैनपुर से ३५-४० किमी दूर सड़क पर पेड़ पड़े हुए हैं। नक्सलियों ने दो दिन के बंद का ऐलान किया है. । कन्फर्म नहीं है की सड़क उन्हीं के द्वारा जाम किया गया है या हवा में पेड़ सड़क पर गिर गए हैं। लेकिन हमारी बस मैनपुर वापस आ गई है और इस वक़्त बस स्टेंड में है। हालांकि किसी प्रकार की दुर्घटना की जानकारी नहीं है पर सारे यात्री दहशत में हैं और रायपुर की तरफ वापस लौटने की भी हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं। सुबह का उजाला होने पर शायद माहोल देखकर बस चलाई जाएगी।

दोस्त से बातें करके मैं सहज तो हो गया पर उसके द्वारा कही गई आखिरी पंक्ति "सुबह का उजाला होने पर शायद माहोल देखर बस चलायी जाएगी" मुझसे प्रश्न करती हुई प्रतीत हो रही है की "हमारे जंगलों में नक्सली आतंक से मुक्त सबेरा अपना उजाला लेकर आखिर कब आयेगा?"

"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

एक नज़र इधर भी...