Monday, June 28, 2010

"रोड जाम, आई एम् सेफ एट मैनपुर"

2९ जून २०१०,

आज तडके साढ़े चार बजे के आसपास सिरहाने के पास वाइब्रेशन मोड़ में रखे सेल फोन के घुरघुराहट से नींद खुल गई। मिचमिचा कर आँखे मलते हुए देखा तो एक पंक्ति में भेजा गया मेरे मित्र का मेसेज था- "रोड जाम, आई एम् सेफ एट मैनपुर।" यह एक पंक्ति का सन्देश अपने साथ अनगिनत प्रश्नों की भीड़ भी साथ लाया था। भिन्न-भिन्न आकारों के प्रश्न चिह्न मेरे सेल फोन के छोटे से स्क्रीन पर उभरने और विलोपित होने लगे। साथ ही उभरने लगीं दिलकश जंगलों के बीच गुजरने वाली ठंडी, सायेदार सड़कों की तस्वीरें भी, जिनके बीच से गुजरने पर महसूस होने वाले आनंद का बयान करने में हमारे शब्दकोष के तमाम लफ्ज़ बौने और अपर्याप्त लगने लगते हैं। सीटी की तरह बजती हुई सुरीली हवाएं हमें भी व्हिसलिंग का दावत देती हुई अपनी खूबसूरती में खो जाने के लिए मजबूर कर देती हैं। अनायास ही मुझे पांच वर्ष पूर्व मैनपुर के पांच दिवसीय शाशकीय दौरे पर सहकर्मियों और वहां के सीधे-सादे लोगों के साथ व्यतीत वक़्त याद आ गया।

मैनपुर... रायपुर से पूर्व दिशा में लगभग १३५ किमी पर स्थित आदिवासी विकासखंड का मुख्यालय। जैसे ही हम नगरीय तामझाम और चकाचौंध के प्रभाव से मुक्त मैनपुर के गावों में प्रवेश करते हैं, वहां के भोले-भाले लोग, तमाम परिश्थितियों में खुश रहने की उनकी प्रवित्ति इन्तहाई तौर पर प्रभावित करने लगती है। मुझे याद है जब हम मैनपुर से २०-२२ किमी दूर तरेंगा विश्रामगृह पहुंचे तो रात के २ बजे का असुविधाजनक वक्त होने पर भी विश्रामगृह के केयर टेकर ने प्रफुल्ल मन से इलायची वाली कली चाय और बेसन के छोटे छोटे पकौड़ो के साथ हमारा स्वागत किया था। यकीन मानिये, सूखी लकड़ियों को सुलगाकर बनायी हुई धुएं युक्त चाय की चुस्कियों में तब जो आनंद आया था वह हमारे शहरों के बड़े बड़े कैफे और रेस्टारेंट में मिल पाना संभव नहीं। मार्च का अंतिम सप्ताह होने के बावजूद; जब ग्रीष्म काल अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर चूका होता है, वहां का मौसम बेहद सर्द था, और सफ़र की सर्दी दूर भागने के लिए हमें चाय और पकौड़ों के साथ साथ आग का भी सहारा लेना पड़ा था। फिर अलसुबह हम केयर टेकर के साथ मार्निंग वाक् के बहाने घने जंगलों में काफी दूर तक घूमने चले गए थे। वाह... कैसी सुहानी सुबह थी। विभिन्न प्रकार के पक्षियों की भांति भांति की आवाजें वहां की सर्द हवा में घुलकर विलक्षण उत्साह का संचार कर रही थीं। एकदम तरोताजा कर देने वाली हिरणों के झुण्ड की धमाचौकड़ी का आनंद लेने का सुअवसर भी हमें मिल गया था। शहरों के भागमभाग और आपाधापी भरी दुनिया से अलग... एकदम अलग ही दुनिया थी वह।
और आज वही मैनपुर नक्सलवादी आहटों से सहमा हुआ दिखाई पड़ता है। आज पूरे क्षेत्र में एक रहस्यमय खामोशी सुनाई पड़ती है हमारे दिलकश जंगल अब हमें अपनी तरफ खींचते नहीं बल्कि डराते हैं। यहाँ की हरियाली में "लाल छींटे" यत्र तत्र प्रश्न बनकर बिखरे नजर आते हैं। हवाए सुरीली लगने की बजाय फुसफुसा कर सचेत करती हुयी प्रतीत होती हैं। मेरे सेल फोन की स्क्रीन से तमाम तस्वीरें धुंधली पड़कर विलुप्त हो गई। नींद का नामोनिशान न रहा आँखों में। कल शाम ही की तो बात है जब मित्र के देवभोग रवाना होने के पूर्व काफी के साथ हम चर्चा कर रहे थे की आजकल कुछ शान्ति है, और अब यह मेसेज? मैंने हडबडा कर मित्र को फोन किया। उसने बताया की मैनपुर से ३५-४० किमी दूर सड़क पर पेड़ पड़े हुए हैं। नक्सलियों ने दो दिन के बंद का ऐलान किया है. । कन्फर्म नहीं है की सड़क उन्हीं के द्वारा जाम किया गया है या हवा में पेड़ सड़क पर गिर गए हैं। लेकिन हमारी बस मैनपुर वापस आ गई है और इस वक़्त बस स्टेंड में है। हालांकि किसी प्रकार की दुर्घटना की जानकारी नहीं है पर सारे यात्री दहशत में हैं और रायपुर की तरफ वापस लौटने की भी हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं। सुबह का उजाला होने पर शायद माहोल देखकर बस चलाई जाएगी।

दोस्त से बातें करके मैं सहज तो हो गया पर उसके द्वारा कही गई आखिरी पंक्ति "सुबह का उजाला होने पर शायद माहोल देखर बस चलायी जाएगी" मुझसे प्रश्न करती हुई प्रतीत हो रही है की "हमारे जंगलों में नक्सली आतंक से मुक्त सबेरा अपना उजाला लेकर आखिर कब आयेगा?"

Thursday, June 24, 2010

"भाई शहरोज का शुक्रिया.."



मित्रों सादर नमस्कार स्वीकार करें,


इस पोस्ट के माध्यम से मैं भाई जनाब शहरोज का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ जिनकी प्रेरणा से मुझे जुल्मशिआर शासन के खिलाफ स्वस्फूर्त छिड़े जनांदोलन की अमर गाथा के पुनर्पठन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। बहुत मुमकिन है उन्होंने मेरी कविता "हिंद के बेटों उट्ठो कि वन्दे मातरम् गाना होगा" के परिपेक्ष्य में मुझे 'आनंद मठ' पढ़ने कि नेक सलाह दी हो। मैं उनकी बेहद इज्जत करता हूँ।


सचमुच, बंगाल के भौगोलिक परिदृश्य पर आधारित यह उपन्यास देश भक्ति कि ऐसी मिसाल देने में कामयाब है, जो कहीं और मिलना गैरमुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर है। पहले से ही दुर्भिक्ष के रूप में कुदरत कि मार झेल रहे बंगाल के बाशिंदे जब अत्याचारी शासक के जुल्मों का भी शिकार होने लगते हैं तब विद्रोह कि एक बेमिसाल गाथा कि नीव रखी जाती है। (यहाँ मेरे लिए यह साफ़ कर देना मुनासिब होगा कि शासक लफ्ज़ का इस्तेमाल मेरे द्वारा किसी मुल्क या कौम के नुमाइंदे के लिए नहीं किया गया है। मेरा मत है कि शासक इन बातों से जुदा होता है, और यदि वह आवाम की सरपरस्ती में कोताही करता है या उसके रंजोगम से वाकिफियत और इत्तफाक न रखते हुए कानून के नाम पर जुल्म उठाने लगता है तो उसके जुल्म और अत्याचार का पुरजोर खिलाफत करने का हक़ उसकी रियाया का बनता है। और यही मसाइल मेरी कविता की बुनियाद हैं।)


कोई ताज्जुब नहीं कि इस किताब ने हिंन्द की जन्गेआज़ादी में कूद जाने कि लिए उस वक़्त के नवजवानों में जूनून और जोश पैदा कर दिया था। लिखे जाने के इतने समय के बाद भी जब यह किताब पढ़ी जाती है और पाठक जब मातृभूमि के संतानों को 'हरे मुरारे, मधुकैटभारे' , और 'वन्दे मातरम्' के जुनूनी नारेबाजी के साथ अपने जान कि बाजी लगाते हुए देखता है तो उसके रोंगटे खड़े हो जाते हैं, और वह स्वयम भी उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने लगता है। बन्दूक के खिलाफ शमशीर की, जुल्म के खिलाफ हौसले कि एक बुलंद आवाज है यह किताब। इसीलिए हिनुस्तानी साहित्य जगत में आनंद मठ का अपना मक़ाम है।


बहरहाल, मुझे आनंद मठ पुनः पढ़ने कि सद्प्रेरणा देने हेतु भाई शहरोज का फिर से शुक्रिया, और साथ ही आप सब से अपनी कविता "हिंद के बेटों....." में एक पद और जोड़ने कि इजाजत चाहता हूँ:


"जंगल में बारूद लगाने वाले सुन,


चलेंगे जब हिंद के मतवाले सुन,


फौलादों से तब तुम्हें टकराना होगा...


संतानों के संग तुम्हें भी वन्दे मातरम् गाना होगा।"


जय हिंद।




"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

एक नज़र इधर भी...