Sunday, March 25, 2012

गजल

ख्वाब देखा जो पल में बिखर जाएगा।  
छोड़ कर अपना घर तू किधर जाएगा।1।  

बोल कर मीठी बोली बुला उसको तू,
साया बन राहों में वो उतर जाएगा।2।

इम्तहां रोजो शब जिंदगी लेती है,  
आग में बन तू कुन्दन संवर जाएगा।3।  

बात दिल में जो है दिल में ही रहने दे,
वक्त खुद सारी उलझन कुतर जाएगा।4।

दो घड़ी होती रौशन शमा तारीकी,                   
सुब्ह होते अन्धेरा गुजर जाएगा।5।

अक्स आईने में जो कभी देखा तो,  
आदमी अपनी सूरत से डर जाएगा।6।

मुद्दते गुजरीं खो कर 'हबीब' आफियत,   
ले के खुशियाँ तू कब अपने द जाएगा।7।

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शब्दार्थ : रोजो शब = दिन रात | शामअ तारीकी = अंधेरों का चराग | आफियत = सुकून 
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शब्दार्थ नहीं दे पाने की भूल हेतु सम्माननीय मित्रवृन्द से क्षमायाचना सहित...
सादर.   

Wednesday, March 21, 2012

पर्यावरणीय दोहे

जंगल जंगल वेदना, मनुज वेदना शुन्य|
भटके भूले राह सब, कहाँ पाप कंह पुण्य||

नादानी है छीनना, हरियाली के प्राण|
वरदाता सब पेड अब, मांगें जीवनदान||

यदि बचाना स्वयं को, अरु अपना संसार|
पेड लगा कर हम करें, सृष्टि का श्रृंगार||

सुलगे सूरज सांझ तक, अम्बर त्राहिमाम|
बादल बरगद छांव में, तनिक करे विश्राम || 
 
पेड़ों की ह्त्या करे, किस खातिर हतभाग?
हरियाली बिन ये धरा, डस लेगी बन नाग||

प्यासी नदिया ताकती, अम्बर मेघ विहीन|
बिन जंगल देखो ज़रा, जगती कितनी दीन|

बाँध द्वेष का भर चला, बंध हुये कमजोर|
वृक्ष प्रेम का रोप कर, जीवन करें विभोर||

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"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

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