Sunday, February 19, 2012

तीर सा कुछ आ जिगर में चुभ गया (ग़ज़ल)

चाँद शरमाता हुआ सा छुप गया |
ले गया दिल और जां ले, उफ़! गया ||

धडकनों में गीत मीठे बज उठे, 
बांसुरी ले आसमां  ही झुक गया ||

वो घटाएं, वो समंदर क्या कहें, 
जुल्फ ओ तर चश्म में दिन बुझ गया ||

आँख से उनकी दो मोती जो गिरे, 
तीर सा कुछ आ जिगर में चुभ गया ||

इक सितारा हूँ फलक में टूटता,
आस्ताना ही सनम का छुट गया ||

कब्र पे मेरी वो आकर रो दिये,
भीग मैं गुल की शकल ले उठ गया ||

शब् सहर ख़्वाबों के दुश्मन हैं 'हबीब',
जिन्दगी का हर खजाना लुट गया ||

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सादर 
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Wednesday, February 15, 2012

क्षणिकाएं

खुशी

गुलाब की
पांखुरी को छूते ही
खामोशी से उतर आई
मेरी तर्जनी की नाख़ून पर
मुस्कुराती हुई
ओस की एक बूँद.....

अभी,
मेरी नाडियों का स्पंदन
मुझे डराने लगा है....
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अस्तित्व

मैंने सोचा था,
वह एक बूँद है....
गिरकर पलकों से
ज़मीन में कहीं खो जाएगा....
मैं गलत था...!
वह एक बूँद का सागर
फैला है दिगंत तक
मेरे सम्मुख....

उसे पार करना
मेरे वश का नहीं,
और डूबने का सलीका
मैं सीख न सका.....!!
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भ्रम

र्द की टहनी से
बिछड आये पत्ते ने
पलकों पर दस्तक दी...
देखा....
चेहरे पर
बेइंतहा ज़र्दी के बीच
चंद हरियाले से छींटे...

यह क्या...!!!
मैंने आँखें मलकर
दोबारा देखा...
कहीं मेरे सामने कोई
आईना तो नहीं.... 
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विरह

मेरे दोस्त...
मेरी राहे हयात से
क्यूँ समेट ली तुमने
अपनी यादों की धूप...??

देख..!
मेरे लफ़्ज़ों की तरह
मेरी रूह भी ठिठुरी जाती है....
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"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

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