सम्मुख मो सम मुख लिये, बैठा रूप विराट ।
अहंकार मेरा सदा, रोके मेरा बाट ।।
फूट गया दिन का किला, रजनी आई फूट ।
मुल्क रहे ना फूट भर, जिनमें पड़ती फूट ।।
जंगल गाय गीत हरे, पल पल सुबहो शाम ।
पर्यावरण बचाने को, जंग लडें अविराम ।।
अपना अन्तर सत्य ही, जैसे एक दर्पन ।
दर्प न मन में लाईये, निर्मल राखिये मन ।।
मंजिल नज़रों में सदा, लक्षित हो स्पष्ट ।
बड़ा निज विश्वास करे, छोटे सारे कष्ट ।।
हिम्मत बहता है सदा, संग रुधिर बन होश ।
हिम मत बनने दे कभी, दह्काया रख जोश ।।
अपने हाथों भाग है, ले संवार तू भाग ।
बैठे भाग न जागता, भाग जगाने भाग ।।
सावन जाने नेह का, बीत गया किस ओर ।
रजनी बिन रजनीश है, व्याकुल हुआ चकोर ।।
रजनी जागत गत हुई, सजना रहे विदेश ।
सजना सजनी का हुआ, बिन सजना अतिशेष ।।
समझे, गुनें, शांत हो, थोड़ी रख परवाह ।
वक्त सुझाए वक्त में, हर उलझन की राह ।।
महका दोहों का चमन, भांति भांति के रंग ।
महका लें हम जिंदगी, सदभावों के संग ।।
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