Wednesday, November 30, 2011

ग़ज़ल (जंजाल आते हैं)

सभी सम्माननीय सुधि मित्रों को सादर नमस्कार कर एक ग़ज़ल महफिले दानां में पेशे खिदमत है... 
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बहर :- बहरे हजज मुसम्मन सालिम | 
मफाईलुन | मफाईलुन | मफाईलुन | मफाईलुन
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विदेशी बेचने हमको हमारा माल आते हैं ।
हमारी जान की खातिर बड़े जंजाल आते हैं ।1।

रहो खामोश अपने देश की बातें न करना तुम,
जुबां खोली अगर, माजी तिरा खंगाल आते हैं ।2।

सभी मिहमान को हम देव की भांती बुला लेते,
लुटेरे भी अगर आये बजाते गाल आते हैं ।3।

नये वादे बनायेंगे हसीं सपने दिखाने को,
यहाँ सीधे सहज लोगों पे टेढ़े चाल आते हैं ।4।

रिवाजो रस्म होते हैं जुदा जंगल के सब यारों
मरे जो भेड तो भी काम उनके खाल आते हैं ।5।

मशीनों की नई इक खेप बस आने ही वाली है,
उधर इनसान डालो तो इधर कंकाल आते हैं ।6।

नजर है नींद से बोझिल मगर सो भी नहीं पाता,
गुलामी के हबीब सपन मुझे विकराल आते हैं ।7

  
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यहाँ सुनें

Friday, November 25, 2011

...जिन्दगी चलती रहे !

जाने क्या था
उन उंगलियों की
हरकत में...
कि जमीन का सीना फाड़कर
सैकड़ों बिजलियाँ
मानों एक साथ
आसमान की ओर लपकीं...
सिमटते धूप का जिस्म
जर्रे जर्रे होकर बिखर गया
दूर तक,
जगमगाने लगा
हर तरफ रक्तिम अंधियारा...
चीखों के बाजार सज गये...
मुर्दा अहसासों के उपर
जिन्दा चीखों के बाजार...
बाजार...!!
जिसका कोई पारावार नहीं...
बाजार...!!
जहां कोई खरीददार नहीं...

दूर क्षितिज के पास
बूढ़ा सूरज
समेट रहा है
क्षत-विक्षत घूप के
जख्मी टुकड़े...
कि कल फिर
पैबन्दों से लबरेज उजाला ला सके...
कि जिन्दगी चलती रहे...
छुपी उंगलियों की वहशियाना हरकतों,
जगमगाते रक्तिम अंधियारों,
और चीखों की
जिन्दा बाजारों के बीच
सांसे पलती रहें...
कि जिन्दगी चलती रहे...!!

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"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

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