सभी सम्माननीय सुधि मित्रों को सादर नमस्कार कर एक ग़ज़ल महफिले दानां में पेशे खिदमत है...
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बहर :- बहरे हजज मुसम्मन सालिम |
मफाईलुन | मफाईलुन | मफाईलुन | मफाईलुन
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विदेशी बेचने हमको हमारा माल आते हैं ।
हमारी जान की खातिर बड़े जंजाल आते हैं ।1।
रहो खामोश अपने देश की बातें न करना तुम,
जुबां खोली अगर, माजी तिरा खंगाल आते हैं ।2।
सभी मिहमान को हम देव की भांती बुला लेते,
लुटेरे भी अगर आये बजाते गाल आते हैं ।3।
नये वादे बनायेंगे हसीं सपने दिखाने को,
यहाँ सीधे सहज लोगों पे टेढ़े चाल आते हैं ।4।
रिवाजो रस्म होते हैं जुदा जंगल के सब यारों
मरे जो भेड तो भी काम उनके खाल आते हैं ।5।
मशीनों की नई इक खेप बस आने ही वाली है,
उधर इनसान डालो तो इधर कंकाल आते हैं ।6।
नजर है नींद से बोझिल मगर सो भी नहीं पाता,
गुलामी के ‘हबीब’ सपन मुझे विकराल आते हैं ।7।
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