Wednesday, July 20, 2011

"केती बर जावौं जी"

जम्मो मयारुक संगी मन ला राम राम...  आरम्भ  अउ गुरतुर गोठ अउ  ललित डाट काम   असन लोकप्रिय ब्लॉग के आदरणीय भाई संजीव तिवारी अउ आदरणीय भाई ललित शर्मा के प्रेरणा ले एक ठन छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल कहे हंव.... आप मन ह देख सुन के रद्दा दिखाहौ इही बिनती हवे.....

"केती बर जावौं जी"




कोन कोती हबरौ संगी केती बर जावौ जी
गाडा गाडा कहिनी काला दुख के सुनावौ जी

मंहगई हर रक्सिन बनके, अंगना म फुगड़ी खेले
जुड धर लिस चुल्हा ल मोर कईसे सुलगावौं जी

नोनी ल जुच्छा थारी, परुसय ओखर महतारी
रोटी, बासी होगे सपना, सपना देखावौं जी

मोर पछीना जेती गिरथे, डबडब ले तरिया भरथे
पानी फेर अन्जरी भर के, बुडे बर न पावौं जी

करजा कर कर के खेती, बाडी-बोनी करथौं जेती
फरगे बन्दूक ओती बर, कईसे जी बचावौ जी

अईसन अलकरहा रद्दा, झन हबीब रेंगव भईया
छोर आवौ बारूद-बम ल, पाँव पर मनावौं जी.
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इही ग़ज़ल ल मोर अवाज म सुनौं



Sunday, July 17, 2011

जीवन संगीत-२

वक्त की पनाहों में, खुशियों की बाहों में
आँधियों के पहरे हैं, जिंदगी की राहों में
कश्ती को तूफां में, चलने-मचलने दो
शक्ति अक्षुण्य लिए, अपनी निगाहों में.
Photo by: Habib.

जीवन इक आशा है, चलना परिभाषा है
बाधाएं हर क़दम, बन खड़ी निराशा है
जीने की चाव लिए, बढ़ने की ताव लिए,
तेरा संकल्प हीकठिनाई में, दिलासा है
दहका ले ज्वाला इक, ह्रदय की उछाहों में

कश्ती को तूफां में, चलने-मचलने दो  
शक्ति अक्षुण्य लिए, अपनी निगाहों में....

लहरों का जोश लिए, सागर सा होश लिए
उठा कदम कराल तू, अम्बर आगोश लिए
पर्वत की छाती पर, छाप छोड़ पावों के
धरती पर गाथा गढ़, उत्कट उदघोष लिए
तेज देख देख तेरा, सूर्य छुपे छाहों में...

कश्ती को तूफां में, चलने-मचलने दो
शक्ति अक्षुण्य लिए, अपनी निगाहों मे....


"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

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