जम्मो मयारुक संगी मन ला राम राम... आरम्भ अउ गुरतुर गोठ अउ ललित डाट काम असन लोकप्रिय ब्लॉग के आदरणीय भाई संजीव तिवारी अउ आदरणीय भाई ललित शर्मा के प्रेरणा ले एक ठन छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल कहे हंव.... आप मन ह देख सुन के रद्दा दिखाहौ इही बिनती हवे.....
"केती बर जावौं जी"
कोन कोती हबरौ संगी केती बर जावौ जी
गाडा गाडा कहिनी काला दुख के सुनावौ जी
मंहगई हर रक्सिन बनके, अंगना म फुगड़ी खेले
जुड धर लिस चुल्हा ल मोर कईसे सुलगावौं जी
नोनी ल जुच्छा थारी, परुसय ओखर महतारी
रोटी, बासी होगे सपना, सपना देखावौं जी
मोर पछीना जेती गिरथे, डबडब ले तरिया भरथे
पानी फेर अन्जरी भर के, बुडे बर न पावौं जी
करजा कर कर के खेती, बाडी-बोनी करथौं जेती
फरगे बन्दूक ओती बर, कईसे जी बचावौ जी
अईसन अलकरहा रद्दा, झन ‘हबीब’ रेंगव भईया
छोर आवौ बारूद-बम ल, पाँव पर मनावौं जी.
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इही ग़ज़ल ल मोर अवाज म सुनौं
