Tuesday, June 7, 2011

संवाद

माँ !
तुझे याद है
वो गर्मी का वक़्त....
खुली छत...
तारों भरी अन्धियारी रात...
तेरे पांवों के झूले...
मुझे सुलाने की कोशिश में
तेरे कहानियों की सुन्दर परियां,
जब थक जातीं....  तुम मुझे
सितारों को गिनने का काम दे देती....
और मैं तेरे हाथों का सिरहाना बनाए
नन्ही उँगलियों के इशारों से
गिनने लगता, सितारों को....
एक, दो, तीन... पचीस... पचास....
जान ही न पाता,
नींद की परियां कब, 
मेरी पलकों पर आ कर बैठ जाती...
और तब तक न जातीं,
जब तक सूरज खुद आकर
उन्हें, बांह पकड़ कर न उठाता.....


गिनने का क्रम 
अब भी जारी है... माँ....!!
जिंदगी के सियाह आसमान में
दर्द के सितारों की गिनती....
एक... दो... सौ... हजार... लाख...
नींद की परियां मगर नहीं आती...
हाँ... सूरज के टुकड़े
जरुर आते हैं
मुझे बांह पकड़ कर बिस्तर से उठाने...


माँ !!
मैं आज तक न समझ पाया
बचपन में
सितारों को गिनते हुए
आने वाली नीदं का कारण
सितारों की गिनती हुआ करती थी
या सर के नीचे रखे
तेरे हांथों की मुलायम गरमी...!!

************

Saturday, June 4, 2011

जीवन संगीत

माना जीवन की डगर अगम.
पर व्यर्थ निराशा, दिनकर भी 
तप कर ही स्वयं, हरता है तम. 

जब चलना है, संदेह  नहीं 
होंगे अवश्य पथ में कंटक 
निज ध्यान लक्ष्य पर रहे बना 
आवें चाहे जितने संकट 
जब है हमने जीवन पाया 
तब क्या सोंचें, कितना दुर्गम.

माना जीवन की डगर अगम....

थे 'पहले' क्या? अज्ञात सही
पर होंगे क्या, अज्ञात नहीं 
है मनुज बनाता स्वभविष्य 
यह सृष्टी की सौगात नहीं 
सुख दुःख की सीमा तज कर ही 
संभव है होना सफल चरम.

माना जीवन की डगर अगम.....

जीवन जीना है बात और 
जीवन है कीट भी जी लेते 
पर संकट में ना हो हताश 
निश्चित है समर वही जीते 
जग एक कसौटी मानव को 
अविचल करते जाना है कर्म.

माना जीवन की डगर अगम...

***************************

"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

एक नज़र इधर भी...