Tuesday, May 31, 2011

"दावत"

ज (३१ मई) ही के दिन पिछले वर्ष की बात है. मेरे एक अज़ीज़ मित्र के बड़े भाई ने  फोन पर मुझे शाम की चाय पर बुलाया. मैं बड़ा हतप्रभ... ऐसा पहले तो नहीं हुआ... बात क्या है? खैर, आफिस से छूटने के बाद शाम उनके चकित करने वाले दावत के बारे में सोचता, मैं उनके घर पहुंचा वहाँ मेरा आश्चर्य और बढ़ गया जब देखा कि हमारे ग्रुप के पाँचों मित्र भी वहाँ बुलाये गये है. सहित हम  सभी चकित थे... मामला क्या है? तभी की पत्नी किचन से चाय और पकौड़े की ट्रे लेकर आई. मैंने इशारे से जानने की कोशिश की तो वह शरारती मुस्कराहट लिए चाय और पकौड़े टेबल में रख कर वापस चली गयी. इसी समय के बड़े भाई अपने कमरे से बाहर निकले और सबके अभिवादन का जवाब देते हुए अपने लिए चाय का प्याला उठाकर हमें चाय-पकौड़े लेने का इशारा करते हुए सामने बैठ गये.

हम सभी मित्रों ने रहस्य की थाह लेने की कोशिश करते हुए चाय समाप्त की.  बड़े भाई की गंभीर मुद्रा देखकर लग रहा था कि जरूर कोई गंभीर बात होगी. तभी वे उठे और एक धमाका सा कर दिया. उन्होंने पेन्ट की जेब से  सिगरेट का डिब्बा निकालकर मेरी ओर बढ़ाया और लेने का इशारा किया. मैं हकला सा गया... य.. य.. ये क्या भईया...? मैं सिगरेट नहीं पिता. बारी बारी उन्होंने सभी दोस्तों को सिगरेट आफर किया सब की हालत खराब... जवाब वही मेरा वाला....आखिर में वे के पास गये और संजीदगी से बोले- मैं भी नहीं पीता सिगरेट, घर में भी कोई नहीं पीता, तुम्हारे कोई दोस्त नहीं पीते... तुमने कैसे इससे दोस्ती कर ली? उस वक्त का चेहरा याद कर अभी तो  मुझे जोर से ठाहाका लगाने की इच्छा हो रही है....(और जैसा कि भाई के चले जाने के बाद लगाया भी  था जोरदार ठहाका हम सभी ने...)  लेकिन उस वक्त.... उफ़! को काटो तो खून नहीं... वह कुछ बोलता उससे पहले ही बड़े भाई साहब फिर बोल पड़े लो.. लो... हिचक कैसी? कल तो थियेटर में बड़े छल्ले बनाए जा रहे थे....

हे भगवान... इन्होने कहाँ देख लिया... मुझे कल संडे शाम की याद आई जब हम सभी दोस्त फिल्म देखने चले गये थे... यह सच है कि मेरे सहित कोई भी मित्र सिगरेट नहीं पीता... भी नहीं... पर जाने क्या शौक चढ़ा था कल उसे इंटरवेल में अचानक सिगरेट लेकर सुलगा ली और फिल्म के हीरो की तरह धुएं के छल्ले बनाने की कोशिश करने लगा..... मैंने कहा भी ये क्या बचपना है...? अभी उम्र रह गयी है तेरी ऐसी हरकत  करने की...? लेकिन बचपना तो बचपना है... उसे भला उम्र से क्या लेना देना... वह तो कभी भी किसी भी रूप में आ सकता है, फिर चाहे वह ३८ साल की उम्र में धुएं का छल्ला बनाने जैसी शरारत के रूप में क्यूँ ना हो....

इसे ही कहते हैं “सर मुडाते ओले पड़ना” जिंदगी में पहली बार सिगरेट को होंठों से लगाया और वह भी देख लिया गया.... दोस्त को भांति भांति के कसम खिला कर बड़े भईया ने कहा- आज तम्बाखू निषेध दिवस है, जो हुआ, हो गया आज के बाद फिर कभी इस खतरनाक चीज को हाथ नहीं लगाना, और वे घर से बाहर चले गये... के  पत्नी की शरारती मुस्कराहट खिलखिलाहट में बदल गयी थी जिसमें हम सब के ठहाके भी शामिल थे... और ....?  उसकी खिसियानी सूरत के तो क्या कहने थे... (हम सभी जानते थे कि वह सिगरेट को दोबारा कभी हाथ नहीं लगायेगा)

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मित्रों, आज वही दिन है ... ३१ मई... तम्बाखू निषेध दिवस तम्बाखू से होने वाली घातक बीमारियों का प्रतिशत निरंतर बढ़ता जा रहा है... निश्चित रूप से आज इस दिवस की सार्थकता को स्थापित करने की आवश्यकता है.... हो सके तो अपने जीवन को धूम्र रहित बनाने का संकल्प लें. सादर नमस्कार.

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Saturday, May 28, 2011

द्रौपदी


गूगल से साभार
समस्त स्नेही जनों को सादर नमस्कार... चिरकन्या का वरदान प्राप्त महाभारत की  अमर पात्र द्रौपदी के सन्दर्भ में   आदरणीया बड़ी बहन संगीता स्वरुप जी की रचना (http://geet7553.blogspot.com/2011/05/blog-post_27.html) और आदरणीया बड़ी बहन रश्मि प्रभा जी की अभिव्यक्ति (http://lifeteacheseverything.blogspot.com/) को पढ़कर स्मृत हो आई अपनी संदार्भानुकुल रचना आदरणीया बड़ी बहन रश्मि प्रभा जी के आशीर्वाद उपरान्त प्रस्तुत है.....

द्रौपदी

द्रौपदी....
तुम व्यर्थ का अपराधबोध
ना पालो अपने मन में...
कि कुरुक्षेत्र की धरा तुम्हारे कारण लाल हुई....

कुरुक्षेत्र की नीव थी
धृतराष्ट्र की नयनहीन पंख लिए,
निराधार प्रतिशोध के आकाश में
उड़ने वाली उसकी महत्वाकांक्षा,
जो बरसना और सींचना जानती थी बादल बनकर
केवल दुर्योधन की कलुषित विचारधारा को....

कुरुक्षेत्र की नींव थे
काल को जीत लेने वाले
भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य के आँखों की पट्टियां,
पट्टियां... जो उन्होंने स्वयं बाँध रखे थे
अपने त्रिकाल दर्शी नेत्रों पर... गांधारी की तरह...
....सिंहासन के सुरक्षा की
....सिंहासन से वफादारी की
....शाही नमक के क़र्ज़ की, मानो सिंहासन बड़ा हो
निरपराध अपने प्राण गंवाने वाले
लक्ष लक्ष सैनिकों के जीवन से.....

कुरुक्षेत्र की नीव था
विनाशकाले विपरीत बुद्धि की उक्ति को चरितार्थ करता
धर्मराज युधिष्ठर का द्युतव्यसन,
जिसने धन दौलत, राज्य, सम्मान
सब कुछ लुटा कर
तुम्हें दाँव पर लगाया...
मानों तुम
जीती-जागती, संवेदनशील स्वतंत्र अस्तित्व न होकर,
आत्मसम्मान विहीन निर्जीव वस्तु थीं....

कुरुक्षेत्र की नीवं थी
वीरता और महानता का छद्म बाना ओढ़े
सदा से स्थापित वह कापुरुष मानसिकता,
जो सदियों सदियों बाद भी
प्रस्फुटित होती है,  
कभी ढोल, गंवार, शुद्र, पशु और नारी को
ताडना का अधिकारी बताते बेशर्म तुकबंदी की तरह,
कभी आरूषी, कभी जेसिका का रूप धरकर
तो कभी तथाकथित सभ्य समाज के क्रूर पंजों द्वारा
महकने से पहले ही मसल दिए जाने वाले  
गर्भस्थ फूलों की शक्ल लेकर....

इसलिए... द्रौपदी !!!
तुम स्वयम को मुक्त करो इस अपराधबोध से...
क्योंकि जब तक
इस कापुरुष मानसिकता का विनाश नहीं होता
कुरुक्षेत्र बनते रहे है, और बनते भी रहेंगे....


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"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

एक नज़र इधर भी...