Thursday, October 7, 2010

"स्वीकारोक्ति"

प्रभु...!

मैं पुनः छला गया....

मैंने देखा था - शैतान,
सांप का रूप धर आया था
सो, तमाम वक़्त
बचाता रहा स्वयं को
विषधरों से,
फिर भी मैं
धोखा खा ही गया.....!!

शैतान इस बार सांप नहीं
इंसान के भेष में आ गया
बहका कर
"स्वार्थ के वृक्ष का
प्रतिबंधित फल" खिला गया....
*
भूल गया फिर
तेरी शिक्षा, तेरा उपदेश
याद रहा केवल आवेश
मैं जला, जलाता गया,
आदर्शों का लहू
बहाता गया....
बहाता गया...

अब, जब नशा
उतरने को है - स्वार्थ का,
डर रहा हूँ,
अदन से निष्काषित हो कर
जमीन पर आया था,
कहाँ जाउंगा
अगर यहाँ से भी निकाला गया...!!!!
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"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

एक नज़र इधर भी...