Saturday, July 24, 2010

"पूर्वाभ्यास"

खुश है आज रमेसर
बहुत खुश,
जोरों से आया है मानसून इस बार,
भर गए हैं ताल-तलैय्या, खेत,
भीगी माटी से
आने लगी है खुशबू "सोंधी- सोंधी",

हल रखे कांधों पर
निकल पड़े हैं किसान,
लोट रहे हैं नंग-धडंग बच्चे
गाव की पानी भरी गलियों में छपाक-छपाक...
देख रहा है रमेसर,
सुनता है किलकारियां बच्चों की,
बैलों के गले में बंधे
घान्ग्रा की मधुर आवाज....

सोचता है रमेसर...
खूब करूँगा मेहनत इस बार,
मिल जाएँगी जब खेत कि माटी में
मेरे पसीने कि बूंदें,
लहलहा उठेंगे खेत,
लगेंगी धान के पौधों पर "बालियाँ सोने की",
चुकता कर दूंगा इस बरस सारे कर्ज...
मुनिया की शादी...
चुन्नू का स्कूल, और...
और.....
सोच न पाया रमेसर इससे आगे,
याद आ गया सहसा उसे
दो एकड़ का अपना खेत...
बंद है जो "तिजोरी" में साहूकार के!!!!

बुझ गई हैं रमेसर की चमकती आँखें,
ख़ुशी के परिंदे
जाने कहाँ काफूर हो गए...
लोट गया रमेसर जाकर
हाथ जोड़े, भगवान् की मूर्ती के सामने....
शायद प्रार्थना कर रहा है वह,
या शायद वह कर रहा होगा
"पूर्वाभ्यास" साहूकार के समक्ष जाने कि!!!!

"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

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