Saturday, July 17, 2010

इंसान और पत्थर कुछ दृश्य...

एक बुनियादी फर्क होता है
इंसान और पत्थर में,
चेतनता और जड़ता का...
किन्तु दोनों में
एक विचित्र संयोग भी देखा मैंने-
"लहू बहाते वक़्त अक्सर पत्थर हो जता है इंसान!!!"
इंसान
जब भी चलता है,
कंकडों, पत्थरों को रौंदता हुआ चलता है,
इसीलिए शायद
अक्सर चला करते हैं पत्थर भी-
और कुचले जाते हैं इंसान !!!
पत्थर
सख्त नहीं होते हमेशा !
जब कभी थककर,
पसीने से लथपथ
सहारा लोगे किसी पत्थर का
तब होगा अहसास-
उसकी "कोमलता" का भी।
दिल का पता नहीं
पर पत्थर जरुर धड़कते हैं।
अक्सर सुनता हूँ
अपने वीरान, सुनसान
घर में धडकनें - दीवारों की।
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"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

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