Thursday, June 3, 2010

हिंद के बेटों उट्ठो के वन्दे मातरम गाना होगा


मई २०१०

आनंद मठ की परंपरा को फिर हमें अपनाना होगा।

हिंद के बेटों उट्ठो के वन्दे मातरम गाना होगा।


आततायी आज अपने ही बने हैं,

तेग भाई की ही भाई पर तने हैं,

एकता का सूत्र पुनः सिखलाना होगा।

हिंद के बेटों उट्ठो के वन्दे मातरम गाना होगा।


शासकों ने आँख अपनी फेर ली है,

सेना अपनी गीदड़ों ने घेर ली है,

बाघ की भाँती हमें लड़ जाना होगा।

हिंद के बेटों उट्ठो के वन्दे मातरम गाना होगा।


आज जीवन ही बड़े खतरे में है,

रक्षक हमारे खुद कड़े पहरे में है,

अपना बीड़ा स्वयं हमें उठाना होगा।

हिंद के बेटों उट्ठो के वन्दे मातरम गाना होगा।


उट्ठो, जागो की सागर मंथन की घडी है,

हिंद की चिंता यहाँ किसको पड़ी है,

महादेव बन गरल हमें पी जाना होगा।

हिंद के बेटों उट्ठो के वन्दे मातरम गाना होगा।


Saturday, May 29, 2010

"बापू कुछ करिए... हमारा तिरंगा 'लाल' हो रहा है..."

२९ मई २०१०।
बापू! मैनें तो किताबों में पढ़कर ही जाना की १५ अगस्त १९४७ को हमारा देश अंग्रेजों की दासता से आज़ाद हुआ था, और तब उस बुलंद हिन्दुस्तान के तामीरे ख्वाब का सफ़र शुरू हुआ था जिस ख्वाब को अपने दिल में लिए आप सहित भारत माँ के जाने कितने बेटों ने अपना तन-मन और जीवन माँ को देकर आँखें बंद कर ली थीं। तब मादरे हिंद की पाक जमीन पर मेरा वजूद भी नहीं था, और यकीन मानिए बापू देश पर कुर्बान हुए भारत माँ के वीर बेटों की दास्ताँ पढ़कर आँखें नाम तो होती हैं, सीना भी फख्र से फूल जाता है। मगर बापू, आप तो तब भारत माँ की गोद में मौजूद थे। जंगे आज़ादी में कुर्बानियों की तमाम गाथाएँ तो आपके सामने ही लिखी गई हैं। 'अपना भारत' के निर्माण का ख्वाब देखने वाली अनगिनत आँखों की अमीमी तो आप ही की आँखों ने किया है। आप ही विश्लेषण कर देखिये की आज हम उस ख्वाब के कितने करीब या दूर आ गए हैं।
बापू, अंग्रेजों से आज़ादी के साथ क्या हमारा देश हर बात से आज़ाद हो गया है? क़ानून और व्यवस्था से, अनुशाशन, कर्त्तव्य, इंसानियत, भावना, सहानुभूति, भाईचारा, प्रेम, स्नेह सब बातों से भी हमारा देश आज़ाद हो गया है क्या बापू?
आज जिस आज़ादी से नक्सली हमारे देश में तांडव कर रहे हैं उससे तो यही लगता है। हम अपने सिपाहियों, जवानों की शहादत भूल भी न पाए की बेबस नागरिकों, निरीह बच्चों पर वे कहर बन कर टूट पड़े हैं। कभी जीते-जागते लोगों को लेकर सडकों पर दौड़ती बस हवा में उछल जाती है, तो कभी रेलगाड़ियों में जिंदगी के परखचे उदा दिए जाते हैं। बापू यह सब बहुत पीड़ादायी है, मगर उससे भी अधिक दुखद आपकी विरासत को सम्हालने वालों की उदासीनता है। 'मौत' के हर धमाकों के बाद ये सभी जोर-शोर से निंदा करने में लग जाते हैं। उनकी हरकतों को कायराना करार देते हैं। उन्हें मुहतोड़ जवाब देने की घोषणा करते हैं, पर अपनी वीरता का कोई भी सबूत नहीं दे पाते। और हद तो तब हो जाती है जब उनके द्वारा बनायी गई जांच कमेटी की रिपोर्ट में कहा जाता है की 'जवानों ने अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मारी।' इससे उनका अर्थ यह है की दंतेवाड़ा में ७६ जवान अपनी ही गलती से मारे गए थे, और भी जितने जवान और नागरिक नक्सली हिंसा का शिकार होकर दम तोड़ रहे हैं, वह भी अपनी गलती से।
सच ही तो है बापू, यह हमारी गलती ही तो है की हमने ऐसी रीढ़ विहीन सरकार चुनी, चुनते रहे हैं और शायद चुनते भी रहेंगे जो निंदा के अलावा कुछ कर ही नहीं सकती। देश की सर्वोच्च सत्ता पर यदि निकम्मे बन्दे काबीज होते हैं तो यह हमारी ही तो गलती है ना
"हम जिनसे हारे हैं,
वो मुट्ठी भर हत्यारे हैं;
ताक़त अपने हाथों में है
फिर भी हम बेचारे हैं।
जिस तिरंगे को आप सहित कुर्बान अनगिनत लोगों ने अपने जीवन से भी ऊंचा दर्जा दिया, वह आज अपने जवानों और नागरिकों की लहू से 'लाल' हो रहा है बापू.... । अगर कर सकें तो आप ही कुछ करिए वरना आपके वारिसों से तो कोई उम्मीद बची ही नहीं है।

"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

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