कैसे कैसे दुष्कृत्य कर जाते हैं हम.... सुबहा होने लगता है कि हम इंसान हैं.... आफरीन को जानकार कुछ दिन पूर्व मेरी पोस्ट बेटियाँ की क्षणिकाएं कमल की पंखुरियों में थिरकती ओस की बूँद और रजनीगंधा के फूल के रूप में आफरीन बनकर आँखों के सामने आ फिर से आ गईं... बिलखती हुईं... जाने शक्ति पूजक यह देश शक्ति की सच्ची आराधना कब करेगा...
सूरत क्या दिखलायेँ बिटिया?
देवों की हम संताने, सच !
दुनिया को भरमायेँ बिटिया।
धरती को माता हम बोलें,
रुदन नहीं सुन पायेँ बिटिया।
तेरे आने की खबरें सुन,
माँ को ही धमकायेँ बिटिया।
अपनी लालच की ज्वाला में,
तुझको भी सुलगायेँ बिटिया।
बिन तेरे दुनिया क्या होगी ?
इतना समझ न पायेँ बिटिया।
भोली भाली मुसकानों को,
डस कर ना पछतायेँ बिटिया।
दूर सुहाना ढोलक फूटे,
जब बेटे धकियायेँ बिटिया।
प्रभु करें इक दिन आए, सब,
बिटिया बिटिया गायें बिटिया।
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खुशियों के दीपक बुझा जा रहे है।
कहाँ जा रहे हम, कहाँ जा रहे है ?
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