सभी सुधी मित्रों को सादर नमस्कार। मित्रों कभी कभी कोई छोटी सी घटना हमेशा के लिए याद बन जाती है; काफी कुछ सिखा जाती है। एक ऐसा ही वाकया इस छोटी सी पोस्ट के जरिये बांटने का अभिलाषी हूँ...
सन्डे, सुबह से एक 'हेल्थ केम्प' में रहा। शुरूआत में मेरे एक अभिन्न मित्र ने मुझसे पूछा - "क्या हम १२ बजे तक फ्री हो पायेंगे? चर्च अटेंड कर लेता।" केम्प में कम से कम ४ बजने की बात सुनकर वे थोड़े मायूस लगे। केम्प साईट से शहर और चर्च की दूरी २० किमी के करीब थी, सो जाकर वापस आ जाना भी थोडा कठिन था। बहरहाल... केम्प में नेत्र रोगी बहुतायत में थे, और जल्द ही हम उनकी जांच और निदान में व्यस्त हो गए। पता ही न चला कि १२ कब बज गए। ध्यान तब आया जब बगल की टेबल से मित्र ने अपना अफ़सोस शेयर किया - "हर सन्डे की रूटीन है, आज चर्च नहीं जा पाया ... कुछ अधूरा सा लग रहा है.... ।"
मैं कुछ कहता उससे पहले मित्र के सामने जांच के लिए बैठे अत्यंत बुजुर्ग व्यक्ति बड़े सहज ढंग और प्यार से बोल पड़े- "बेटा वह बड़ा दयालु है, वह किसी से दूर नहीं रहता, किसी को अपने से दूर नहीं करता। आज तुम चर्च नहीं जा पाए हो ना, इसीलिए देखो (मरीजों की कतार की तरफ इशारा करते हुए) खुद प्रभु ईशु कितने मुख्तलिफ रूप लेकर तुम्हारे पास आ गए हैं।"
बुजुर्गवार के ये चंद अल्फाज; मैंने महसूस किया कि मेरे मित्र के साथ मेरे भी चेहरे पर भी एक मधुर मुस्कराहट बन कर फ़ैल गए है, साथ ही मैंने देखा कि सामने बैठे झुर्रीदार मासूम चेहरे पर भी एक निष्पाप मुस्कराहट तैर रही है। अपनी शंका का निराकरण कर और वातावरण में एक उत्साह भर कर वे बुजुर्ग चले गए।
इस वाकये के बाद मेरा मित्र जैसे चर्च ना जाने के अवसाद से मुक्त हो रोगियों के शंकाओं के निराकरण में तल्लीन हो गया। उसके चेहरे पर एक मुक़द्दस सी, अलौकिक सी मुस्कराहट और सुकून था। मेरे जेहन में जनाब निदा फाजली जी का एक शेर उभर आया-
"घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें,
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।"
मैंने महसूस किया कि बगल की टेबल पर मेरा मित्र बैठ कर रोगियों की जांच नहीं कर रहा; बल्कि खुद जनाब निदा फाजली जी बैठ कर एक प्यारा सा गीत रच रहे हैं। मैं कल्पना में देखने लगा उनके चेहरे का सुकून मेरे मुल्क के हर चेहरे पर एक सामान छा गया है, और साथ ही छा गया है उनके शेर का हर लफ्ज़। आमीन।
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