Thursday, September 9, 2010

"ईद मुबारक"

सभी स्वजनों को "ईद मुबारक", मित्रों, दुनिया में हर इंसान का सबसे बड़ा धर्म और कर्म अपने ज़मीर को, दिल को तथा अपनी रूह को पाक और साफ़ रखना है...
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"नैरंगिए नज़र है, दुनिया तो फ़क़त फानी है,
इक रूहे पाक ही हकीक़ते आसमानी है। "
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ईद के इस मुबारक मौके पर इन्हीं ज़ज्बातों के साथ, महफिले दानां में, आपका यह नादां हबीब एक प्यारी सी, मुक़द्दस सी पोस्ट "रूहे पाक" लेकर हाज़िर है...

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नूरे इलाही का सच्चा दीद यही है।
यौमे मसर्रत है, दीने ईद यही है।
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बाहम सभी अफ्राद भाई इस जहां के हैं।
हर रोजाए रमजान की ताकीद यही है।
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कुछ भी जब नहीं था, और होगा भी कुछ नहीं।
था खुदाए पाक और खालिद यही है।
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दुनिया में करने आये क्या, करते रहे है क्या?
हर राज का गवाहे चश्मदीद यही है।
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आंसू किसी की आँख में आने न दे कभी।
अल्लाह की सबसे बड़ी ताईद यही है।
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भूले न उसको साथ हरक़दम उसे रखें।
हर इंसान से 'हबीब' की उम्मीद यही है।
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शब्दार्थ:
नैरंगिए नज़र = दृष्टी भ्रम। फानी = क्षणीक। हक़ीक़ते आसमानी = चरम सत्य। नूरे इलाही = ईश्वरीय ज्योती। दीद = दर्शन। यौमे मसर्रत = आनंद का दिन। बाहम = आपस में। अफ्राद = इंसान। ताकीद = हुक्म। खालिद = अविनाशी। ताईद = सेवा। हबीब = दोस्त।
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Saturday, September 4, 2010

"प्रमानपत्रम देहि"

मित्रों, एक महत्त्वाकांक्षा प्रायः सभी इंसानों की होती है- "सर्टिफिकेट अर्थात प्रमाणपत्र प्राप्त करना। बचपन में मैंने स्कूल के सालाना गेदरिंग बड़ी कक्षा के भईया लोगों को उछल कर, दौड़ते हुए स्टेज में जाकर मुख्या अतिथी के हाथों प्रमाणपत्र ग्रहण कर दो मील लम्बी मुस्कान और दो गज का सीना लेकर स्टेज से उतरते देखा था। तभी से मेरे भीतर इस महत्त्वाकांक्षा का कीड़ा सर से पाँव तक फुल स्पीड में दौड़ लगाने लगा। यह वक़्त - बेवक्त काट कर मुझसे कहता- "अरे निकम्मे, कुछ कर, तेरे तमाम साथी कितनी बार स्टेज पर जाकर बड़े बड़े अतिथियों के हाथों प्रमाणपत्र प्राप्त कर इठला रहे हैं। और एक तू है, जो स्टेज तो क्या उसके आसपास भी नहीं पहुच सका। धिक्कार है तुझ पर...., इत्यादि... इत्यादि... ।
रोज रोज उस कीड़े की खटखट सुनते सुनते मैं तंग आ गया, और मन में ठान लिया कि अब तो चाहे जो हो जाए बॉस! प्रमाणपत्र तो मैं ले के रहूंगा। इसी सिलसिले में मैंने स्कूल की काव्य पाठ प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर एक जोरदार कविता सुनायी। खूब वाहवाही हुई, भयंकर शाब्बाशी मिली। पीठ ठोंकने वालों नें मेरे बेक बोन पर ही प्रश्न चिह्न लगा डाला। तब जाकर मैंने जाना किसी और की रचना को अपना बता कर पढ़ना या सुनाना कितना खतरनाक होता है। जिस कान को पकड़ कर मास्टरों ने मुझे स्टेज से उतार दिया था, उसी कान को छू कर और यह महसूस करते हुए कि वह अपने स्थान से उखडा नहीं है, मैंने कविता (मेरा तात्पर्य किसी लड़की से ना होकर काव्य विधा से है) की ओर आँख उठा कर ना देखने की कसम उठा ली। लेकिन प्रमाणपत्र प्राप्त करने की भी तो ठानी थी, सो कुछ तो करना ही था।
अपनी तमाम ताक़त लगाकर सोच विचार करने जैसा दुरूह कार्य करने के पश्चात मैंने निष्कर्ष निकाला- "खेल", सो खूब खेला। खूब उछल उछल कर बालिंग की, खूब जम कर बैटिंग की, इतना जमा कि एक एक क्लास में तीन तीन साल लगा दिए। लेकिन मित्रों की साजिश देखिये, दुष्टों ने हमेशा मुझसे अच्छा खेल दिखाया और प्रमाणपत्र से मेरे हाथों की दूरी को बढ़ाते चले गए। चार-पांच बार फेल होकर, चार-पांच दांत तुड़वाकर मुझे जमीन नजर आ गयी। प्रमाणपत्र के नज़दीक भी ना जा पाया तो इधर से भी ध्यान हटाया।
मेरी परेशानी को देख व समझ कर मेरे एक मित्र नें सुझाया- "तुम तो यार चित्रकारी करो, मैंने इसमें दर्ज़नों सर्टिफिकेट हथियाए हैं। एकाध तो तुम्हें भी जरुर मिल जाएगा।" अतः बड़ी आस लेकर मैं रंगों को ड्राईंग बोर्ड पर पानी की तरह बहाने लगा, और अपनी माँ को 'दाग अच्छे होते हैं' यह विश्वाश दिलाता रहा। फिर एक दिन अपने चित्रकार मित्र की मदद से पानी की तरह बहे हुए रंगों वाले ड्राईंग बोर्डों को एक चित्रकला प्रदर्शनी में दाखिल करा पाने में सफल हो गया। अपने मित्र के साथ साथ मैं भी निश्चिन्त था कि अब तो एकाध सर्टिफिकेट मिल ही जाएगा। परन्तु यह क्या..... ? दर्शकों, आयोजकों और जजों की नज़र में अपने पेंटिंग्स से जादा मैं ही चढ़ गया। नतीजतन, इतना अच्छा "माडर्न आर्ट" बनाने की एवज में प्रमाणपत्र मेरे निर्माताओं, अर्थात मेरे माता-पिता को देना सुनिश्चित कर लिया गया।
उफ!! ऐसा कुठाराघात !!! क्या प्रमाणपत्र पाने की मेरी इच्छा कभी पूरी नहीं हो पायेगी? दिन रात, सोते जागते एक ही सोच- प्रमाणपत्र, प्रमाणपत्र और प्रमाणपत्र बस, और कुछ नहीं.... । इसी उधेड़बुन में मैंने एक दिन किसी फिल्म में देखा, फांसी में लटकाए जाने से पूर्व जेलर कैदी से उसकी अंतिम इच्छा पूछ रहा है। वाह दिल बाग़ बाग़ हो गया देखकर। मुझे रास्ता मिल गया था प्रमाणपत्र पाने का। बस मुझे किसी तरह सजाए मौत पानी थी, और अंतिम इच्छा के रूप में प्रमाणपत्र मांग लेना था। वाह!!! मैंने यह फिल्म पहले क्यों न देखी? यह आईडिया मुझे पहले क्यों न सुझा? बस, क्या था, मैंने एक दिन घात लगाकर एक नवजवान को ट्रक के आगे धक्का दे दिया, और बड़े सुकून के साथ सोचने लगा कि अब मुझे प्रमाणपत्र पाने से कोइ नहीं रोक सकता। मगर वाह री बेवफा किस्मत....!!! यहाँ भी दगा दे गयी। मृतक के जेब से पुलिस को एक चिठ्ठी मिल गई, लिखा था- "गरीबी, मुफलिसी, बेरोजगारी और भूख से हारकर मैं आत्महत्या कर रहा हूँ। मेरी मृत्यु के लिए कोई भी दोषी नहीं है।
अब क्या बताऊँ... मैं खूब चिल्लाया, चिल्ला चिल्ला कर सबको बताया कि अरे दुनिया वालों, मैंने प्रमाणपत्र पाने की खातिर इस नवजवान की हत्या की है। पर किसी ने मेरी एक न सूनी। उलटे पुलिस ने पकड़ कर मुझे मेंटल हास्पिटल में भर्ती करा दिया।
अभी यहीं हूँ। उम्मीद की किरण अभी भी बुझी नहीं हैं... पागलों से सूना है कि ठीक होने के बाद अस्पताल से छुट्टी के वक़्त एक प्रमाणपत्र दिया जाता है। बस इसी उम्मीद में जी रहा हूँ और खुशी खुशी बिजली के झटकों और कई बार बेतों की सटासट को भी झेले जा रहा हूँ। जानता हूँ आप सभी सहृदय मित्रगण जरुर प्रार्थना कर रहे होंगे कि मुझे प्रमाणपत्र मिल ही जाए।
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"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

एक नज़र इधर भी...