
आज याद आये पिताजी...
नयन में बूंदों की भांति
तनिक झिलमिलाये पिताजी...
जानता हूँ वे नहीं हैं,
देखता हूँ पर यहीं हैं,
जब भी बेबस सा मैं होता,
हाथ काँधे पर रखे और
राह दिखलाए पिताजी...
सूर्य की कभी ताव बनकर,
बादलों की छाँव बनकर,
दूर बरगद से उमडती
चंचल पवन का रूप धरकर
केश सहलाए पिताजी...
दीप सीखों का जलाए,
पास आये मुस्कुराए,
स्नेहसिक्त नयनों से तोले,
चंद जीवन के क्षणों का
राज बतलाये पिताजी...
थक के जब भी चूर सा मैं,
भाग्य से मजबूर सा मैं,
धराभिमुख हो मौन बैठा,
गान पंछियों का मधुर बन
उत्साह भर जाये पिताजी...
बहुत याद आये पिताजी...
