Friday, June 18, 2010

बहुत याद आये पिताजी...


आज याद आये पिताजी...
नयन में बूंदों की भांति
तनिक झिलमिलाये पिताजी...

जानता हूँ वे नहीं हैं,
देखता हूँ पर यहीं हैं,
जब भी बेबस सा मैं होता,
हाथ काँधे पर रखे और
राह दिखलाए पिताजी...

सूर्य की कभी ताव बनकर,
बादलों की छाँव बनकर,
दूर बरगद से उमडती
चंचल पवन का रूप धरकर
केश सहलाए पिताजी...

दीप सीखों का जलाए,
पास आये मुस्कुराए,
स्नेहसिक्त नयनों से तोले,
चंद जीवन के क्षणों का
राज बतलाये पिताजी...

थक के जब भी चूर सा मैं,
भाग्य से मजबूर सा मैं,
धराभिमुख हो मौन बैठा,
गान पंछियों का मधुर बन
उत्साह भर जाये पिताजी...
बहुत याद आये पिताजी...

Saturday, June 12, 2010

बचाओ... बचाओ.. बचाओ...


यह एक आम दृश्य है। आते जाते हम ऐसे अनेक मंजर देख सकते हैं जहाँ एक सरकारी विभाग ने खुदाई की, पानी का अन्डर ग्राउंड पाईप लाइन फूट गया और जब तक सम्बंधित विभाग के कर्मचारी मरम्मत कर पायें जाने कितना पानी फ़िज़ूल बह गया।
पानी की बर्बादी रोकने हेतु जितनी जागरूकता की जरूरत आम जनता में है, उतनी ही आवश्यकता सरकारी विभागों के मध्य समन्वय की भी है। आज जहाँ शहर के अनेक बस्तियों में पानी की बेहद कमी से वहां के बाशिंदे परेशान हों और पानी के लिए इधर उधर भटक रहे हों, सरकारी नलों के सामने रतजगा कर रहें हों, पानी के टैंकर की आमद से भगदड़ सी मच जाती हो, वहां पानी की ऐसी बर्बादी को एक आपराधिक कृत्य कहा जाना अतिशयोक्ति नहीं होगी।
सार्वजनिक नलों से टोंटियों की चोरी टोंटी होने पर भी उसे खुला छोड़ देना, व्यक्तिगत भवनों के ओवर हैड टंकियों से पानी का निरंतर ओवेर्फ्लो आदि भी कुछ ऐसे ही कारण हैं जिनसे पानी की बेतहाशा बर्बादी होती है। आइये पानी की कीमत पहचाने। आने वाले समय में यदि हम अपने कंठों को शुष्क होने से बचाना चाहते हैं तो हम सबकोजागरूक होकर जल संरक्षण हेतु गंभीर प्रयासों का संकल्प लेना होगा।

"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

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