Saturday, September 10, 2011

तब से अब तक...

"वह तोड़ती पत्थर"



तब से अब तक 
बहुत कुछ बदला है...
दसों दिशाओं में उद्धृत हैं 
सफलता की गाथाएँ...
गति और प्रगति के 
विराट चरणचिह्न
नित्य नुमाया हैं
चन्द्रानन में.....
स्वआनन में भी...
सगर्व... सस्मित...

लेकिन...
तब से अब तक
सूर्य वही है...
उसका प्रचंड तेज भी... बल्कि...
बढ़ ही रहा है,
निर्धन पेट की ज्वाला की भाँति...
भूख - प्यास वही.... अभ्यास वही...
स्वेद सिंचित उच्छ्वास वही...
उस 'पत्थर तोड़ती' 
प्रतिमूर्ति की किस्मत...
कृष्ण पक्ष के बढ़ते अंधियारे... और...
घटती चन्द्रकलायें ही हैं...
तब से अब तक. 

*****************************************************************************
दृश देख महाकवि निराला जी की कालजयी रचना अन्तस्पटल में सजीव हो उठी,  
बरबस ही कुछ पंक्तियाँ कौंध गयी जेहन में... ससम्मान समर्पित...
***************************************************************************** 


30 comments:

  1. marmsparshi ....bahut sunder bhav.....

    ReplyDelete
  2. श्रमजीवी और कृष्णपक्ष का बढ़ता अंधियारा ! हृदयस्पर्शी कविता।

    ReplyDelete
  3. लेकिन...
    तब से अब तक
    सूर्य वही है...
    उसका प्रचंड तेज भी... बल्कि...
    बढ़ ही रहा है,
    निर्धन पेट की ज्वाला की भाँति...
    भूख - प्यास वही.... अभ्यास वही...
    स्वेद सिंचित उच्छ्वास वही...
    उस 'पत्थर तोड़ती'
    प्रतिमूर्ति की किस्मत...
    कृष्ण पक्ष के बढ़ते अंधियारे... और...
    घटती चन्द्रकलायें ही हैं...
    तब से अब तक. ... jab mann kee vyakulta dam todne lagti hai tab shabd bhawnaaon ke uchhal prawah ko yun hi samette hain , arth dhoondhne ke liye ganga se saagar tak kee yatra karte hain .... kash , kahin to koi vikalp ho

    ReplyDelete
  4. भूख - प्यास वही.... अभ्यास वही...
    स्वेद सिंचित उच्छ्वास वही...
    उस 'पत्थर तोड़ती'
    प्रतिमूर्ति की किस्मत...
    कृष्ण पक्ष के बढ़ते अंधियारे... और...
    घटती चन्द्रकलायें ही हैं...
    तब से अब तक.

    सटीक एवं संवेदनशील अभिव्यक्ति...

    ReplyDelete
  5. उस 'पत्थर तोड़ती'
    प्रतिमूर्ति की किस्मत...
    कृष्ण पक्ष के बढ़ते अंधियारे... और...
    घटती चन्द्रकलायें ही हैं...
    तब से अब तक.

    यही विडम्बना है.....अंतर्मन को उद्देलित करती पंक्तियाँ....

    ReplyDelete
  6. kuch chiijein kal ke sath bhi nahi badaltin.

    ReplyDelete
  7. जी हाँ, कुछ भी नहीं बदला है ...

    ReplyDelete
  8. उस 'पत्थर तोड़ती'
    प्रतिमूर्ति की किस्मत...
    कृष्ण पक्ष के बढ़ते अंधियारे... और...
    घटती चन्द्रकलायें ही हैं...
    तब से अब तक.
    --
    हकीकत भी यही है!

    ReplyDelete
  9. अट्टालिकाओं मे सूरज उगता और झोपडियों मे अंधियारे
    क्या विकास का मद है ऐसा फ़ाकाकश न लगते प्यारे

    ReplyDelete
  10. Kvita jijivisha ko pradarshit karti hai. aabhar

    ReplyDelete
  11. वह तोड़ती पत्थर के संदर्भ आज के परिप्रेक्ष्य में बड़ी कुशलता से लेकर अति विचारणीय रचना लिखी है.

    ReplyDelete
  12. अद्भुत!
    इस रचना के बिम्बों में वही ताज़गी है जो निराला की तोड़ती पत्थर में थी। शायद इसलिए कि तब और आज में इन रचनाओं के पात्र की क़िस्मत में कोई तबदीली नहीं आई है।

    ReplyDelete
  13. सूर्य वही है...
    उसका प्रचंड तेज भी... बल्कि...
    बढ़ ही रहा है,
    निर्धन पेट की ज्वाला की भाँति...

    लेकिन उस ज्वाला को शांत किस तरह से किया जा सकता है यह आज तक किसी ने सोचा नहीं ...जिन पर सोचने के जिम्मा सोंपा गया था वह खुद ही उनके मुंह का निवाला छीन रहे हैं ...आपने बहुत सुन्दरता से प्रकाश डाला है ...आपका आभार

    ReplyDelete
  14. निर्धन पेट की ज्वाला की भाँति...
    भूख - प्यास वही.... अभ्यास वही...
    स्वेद सिंचित उच्छ्वास वही...
    उस 'पत्थर तोड़ती'
    प्रतिमूर्ति की किस्मत...

    सत्य को कहती अच्छी और मार्मिक प्रस्तुति

    ReplyDelete
  15. गरीबों के दुःख कम नहीं होंगे जब तक सत्ता में बैठे संवेदनशील नहीं हो जाते।

    ReplyDelete
  16. प्रतिमूर्ति की किस्मत...
    कृष्ण पक्ष के बढ़ते अंधियारे... और...
    घटती चन्द्रकलायें ही हैं...
    तब से अब तक.

    संवेदना को झकझोरती रचना

    ReplyDelete
  17. सूर्य का प्रचंड होना और चंद्र कलाओं का घटना - बहुत सही विवेचन दिया है आपने

    ReplyDelete
  18. बहुत संवेदनशील और मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति...

    ReplyDelete
  19. बहुत सार्थक रचना |सुन्दर शब्द चयन |बधाई
    आशा

    ReplyDelete
  20. संवेदनशील, हृदयस्पर्शी कविता. बधाई.

    ReplyDelete
  21. अच्छी और मार्मिक प्रस्तुति
    दिल को छू गई , बहुत बढ़िया !!!

    ReplyDelete
  22. Bahut Sundar Habib Sahab.. Samvedansheel prastuti.. Aabhar..

    ReplyDelete
  23. सत्य को दर्शाती संवेदनशील और मार्मिक प्रस्तुति...

    ReplyDelete
  24. जब तक दुनिया है सखे, तब तक पत्थर राज |
    पत्थर से टकराय के, लौटे हर आवाज ||

    लौटे हर आवाज, लिखाये किस्मत लोढ़े,
    कर्मों पर विश्वास, करे क्या किन्तु निगोड़े ?

    कोई नहीं हबीब, मिला जो उसको अबतक,
    जिए पत्थरों बीच, रहेगा जीवन जब तक ||

    ReplyDelete
  25. मार्मिक ... कठोर सत्य ...
    बहुत संवेदनशील रचना ..

    ReplyDelete
  26. संवेदनशील अभिव्यक्ति........

    ReplyDelete
  27. कृष्ण पक्ष के बढ़ते अंधियारे... और...
    घटती चन्द्रकलायें ही हैं...

    बेहतरीन प्रयोग......

    ReplyDelete
  28. बहुत सुन्दर और सटीक प्रस्तुति- मिश्रा जी !
    निराला जी का काव्य आज आज भी प्रासंगिक है और कल भी रहेगा

    ReplyDelete

मेरी हौसला-अफजाई करने का बहुत शुक्रिया.... आपकी बेशकीमती रायें मुझे मेरी कमजोरियों से वाकिफ करा, मुझे उनसे दूर ले जाने का जरिया बने, इन्हीं तमन्नाओं के साथ..... आपका हबीब.

"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

एक नज़र इधर भी...