Sunday, July 24, 2011

"उड़ सपनों के पंख लगा"

तदबीरों पर दाँव लगा.
अपनी किस्मत आप जगा.

लकीरों पर विश्वास न कर,
अक्सर ये दे जायें दगा.

भला, कौन  इस दुनिया में,
वक़्त ने जिसको नहीं ठगा.

शाम ज़रा हो ले फिर देख.
साया भी संग छोड़ भगा. 

हौसले का साथ न छोड़,
गैरों में बस यही सगा.

हबीब गगन यह तेरा है,
उड़ सपनों के पंख लगा.


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24 comments:

  1. वाह जनाब हौसलो से टूटेगा ताला जो तिलिस्म मे है लगा

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  2. hausala jagati sunder abhivyakti .....

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  3. भाई हबीब साहब आदाब |अच्छा लिखा है आपने बधाई और शुभकामनायें

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  4. शाम ज़रा हो ले फिर देख.
    साया भी संग छोड़ भगा.

    वाह.
    अच्छा लिखा.

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  5. हबीब साहब आदाब |
    ..........अच्छा लिखा....!

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  6. पहली बार पढ़ रहा हूँ आपको और भविष्य में भी पढना चाहूँगा सो आपका फालोवर बन रहा हूँ ! शुभकामनायें

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  7. मेरे ब्लाग पर आने के लिए धन्यवाद.
    खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  8. हौसला बढाती रचना...

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  9. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 26-07-2011 को चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.com/ पर मंगलवारीय चर्चा में भी होगी। सूचनार्थ

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  10. भला, कौन इस दुनिया में,
    वक़्त ने जिसको नहीं ठगा.

    शाम ज़रा हो ले फिर देख.
    साया भी संग छोड़ भगा.

    सटीक लिखा है ..बहुत सुन्दर भावों को समेटे गज़ल

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  11. bhaut hi sunder bhaavo ko prstut karti rachna....

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  12. हौसले का साथ न छोड़,
    गैरों में बस यही सगा.
    --क्या बात कही है! वाह!

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  13. लकीरों पर विश्वास न कर,
    अक्सर ये दे जायें दगा.

    बहुत बढ़िया लिखा है शायद पहली बार आई हूं ब्लाग पर ...अच्छा लगा...फॉलो भी कर लिया है ताकि आगे भी पढ़ती रहूं....

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  14. लकीरों पर विश्वास न कर,
    अक्सर ये दे जायें दगा.
    behtreen gazal

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  15. छोटी बहर में लिखी लाजवाब गज़ल ... दार्शनिक अंदाज़ लिए .. गज़ब के शेर ...

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  16. 'शाम जरा हो ले फिर देख
    साया भी संग छोड़ भगा '
    .................सच्चा शेर
    .......छोटी बहर की उम्दा ग़ज़ल हबीब भाई

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  17. हौसले का साथ न छोड़,
    गैरों में बस यही सगा.

    हबीब गगन यह तेरा है,
    उड़ सपनों के पंख लगा.

    हौंसलो से ही ये जिन्दगी बंधी है

    आभार

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  18. कम शब्दों में बड़ी बात कही है आपने, धन्यवाद

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  19. शाम ज़रा हो ले फिर देख.
    साया भी संग छोड़ भगा.

    हबीब साहब.. बहुत सच्ची कही आपने..

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  20. भला, कौन इस दुनिया में,
    वक़्त ने जिसको नहीं ठगा.
    शाम ज़रा हो ले फिर देख.
    साया भी संग छोड़ भगा.

    बहुत ही खूबसूरत अलफ़ाज़....लाजवाब गज़ल ...

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मेरी हौसला-अफजाई करने का बहुत शुक्रिया.... आपकी बेशकीमती रायें मुझे मेरी कमजोरियों से वाकिफ करा, मुझे उनसे दूर ले जाने का जरिया बने, इन्हीं तमन्नाओं के साथ..... आपका हबीब.

"अपनी भाषा, हिंदी भाषा" (हिंदी में लिखें)

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